Tuesday, 28 April 2020

असली मजा तो देने में है।

Give things to poor

INTRODUCTION.
             बताओ बच्चों 25 दिसंबर को क्या मनाया जाता है ?बिल्कुल सही किसमस डे ।टॉफिया कौन बैठता है? बच्चों  बिल्कुल सही सैंटा क्लॉस। इस दिन कई लोग सैंटा क्लॉस का रूप बनाकर छोटे-छोटे बच्चों को टॉफिया बांटते हैं। आपने देखा होगा ना बच्चों आपके आसपास कोई न कोई ऐसा होगा जो अक्सर टॉफीया बाँटते होंगे ।जानते हो वे बच्चों को टॉफिया क्यों बांटते हैं ?क्योंकि उनको टॉफी के बदले सुख मिलता है। कैसा सुख देने का सुख क्योंकि असली मजा तो देने में है ।यह ऐसा सुख है जो हमें तब मिलता है या इस सुख का अहसास तब होता है जब हम देना सीखते हैं ।ऐसी खुशी जो दूसरों के चेहरे पर झलकतीहै जब आपकी छोटी सी मदद के कारण उनका कोई काम पूरा हुआ हो या जब आप उनको कुछ देते हैं। देना एक मानवीय गुण है जो देता है दूसरों के लिए करता है सही अर्थ में वही मानव है ।मनुष्य वही जो मनुष्य के लिए करें वरना जानवर तो आप ही आप चरे।
प्रकृति से भी हमें कितना कुछ मिलता है प्रकृति तो सिर्फ देती है कुछ लेती नहीं है बदले में। जैसे सूर्य के प्रकाश से संसार को रोशनी मिलती है चंद्रमा से शीतलता बादलों से बारिश हवा से जीवन फूलों से खुशबू पेड़ पौधों से फल सब्जियां नदियों से पानी और भी न जाने कितना कुछ वह अपने लिए कुछ भी नहीं रखते तभी तो तुलसीदास जी ने भी कहा है -तरुवर कबहु न फल भखै। नदी न संचय नीर परमारथ के कारण साधु धरा शरीर। यानी पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते ।नदियां भी अपना पानी खुद नहीं पीती । तो असली मजा देने में है ।
 जो देना सीखता है सबके साथ बाँटता है 
  वही अनमोल सुख को पाता है ।
क्योंकि असली मजा तो सबको देने में है।
थोड़ा देखकर बहुत सारा सुख पा लेना अक्सर हम सभी के साथ ऐसा होता है अपने छोटे भाई बहन को अपनी मनपसंद कोई चीज देनी पड़ती है तो हम उन्हें देते हैं या फिर उनके मांगने पर मना कर देते हैं देकर देखना बच्चों जब आप अपने भाई बहन को मांगने पर वह चीज देते हैं जो आपको बहुत पसंद है तब क्या होता है आपके भाई बहन खुश होकर आप से गले मिलते होंगे ।आपको थैंक्यू कहते होंगे। उस वक्त हमें जो खुशी प्यार सुख मिलता है वह बहुत अनमोल होता है ।तो अनमोल सुख कब मिलेगा? जब हम देना सीखेंगे। जरूरी नहीं भाई बहन को ही दे हम किसी को कुछ भी दे सकते हैं। देने का गुण हमारे अंदर हो तो हम किसी को भी कुछ भी देकर एक अच्छा काम करते हैं क्योंकि असली मजा तो देने में है ।
यही बात वंश भी जानता था । वंश और  प्रतीक दोनों बहुत अच्छे दोस्त। एक बार प्रतीक वंश के पास आया और उससे वंश को अपना बहुत सुंदर बैट दिखाया। प्रतीक ने कहा देखो मेरा बैट कैसा लग रहा है? वंश ने बैट देखा और कहा अरे वाह यह तो बहुत अच्छा बैट  है कहां से आया तुम्हारे पास। तब प्रतीक ने कहा मुझे मेरे बङे भाई ने पूरी क्रिकेट किट दी है । यह बैट भी उस मे था ।वश हाथ में बैट उठा कर देख रहा था ।उसके बाद प्रतीक में वंश से कहा कि क्या सोच रहे हो यही ना कि काश मेरा भी बड़ा भाई होता तो मुझे इतना अच्छा बैट  गिफ्ट करता। वंश ने  कहा नहीं- मैं तो यह सोच रहा हूं कि मैं इस लायक बनू  कि मैं अपने छोटे भाई को ऐसा बैट ले कर दूं क्योंकि जो खुशी तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारे बड़े भाई ने दी है वही खुशी मैं अपने छोटे भाई को भी दू  क्योंकि असली मजा तो देने में है। जो देने में सुख है वह पाने में नहीं है ।
STORY-
यही बात एक बार एक गुरु अपने शिष्यों को समझा रहे थे की असली सुख देने में है पाने में नहीं है तभी अचानक एक शिष्य उठकर बोला यह कैसे संभव है हमें तो पाकर सुख मिलता है हमें खुशी होती कि हमें कुछ मिला है तो फिर देने में कैसे?तभी उनके गुरु जी ने शिष्य को एक खाली बोरी दी और दूसरे शिष्य को खाने के सामान से भरी हुई बोली दी फिर उनके गुरु जी कहते हैं तुम दोनों को 10 कोस यानी कि 30 किलोमीटर तक यह बोरी लेकर चलना है फिर वापस आना है उसके बाद मैं आप सभी को समझा लूंगा की देने में कितना सुख है जिसे भरी हुई बोली भी गई थी उसकी बोली काफी भारी थी कयोंकि उस में खाने पीने का सामान था। उनके  गुरुजी ने कहा तुम्हें रास्ते में जो भी जरूरतमंद दिखे उन्हें इस बोरी में से खाने का सामान बाँट आना है। शिष्य ने कहा जी गुरु जी जैसा आप कहें मैं ऐसा ही करूंगा जो रास्ते में जरूरतमंद दिखेगा मैं उसको खाने का सामान बांटा आऊंगा  और गुरु जी ने खाली बोरी वाले वाले शिष्य से कहा रास्ते में जो भी कीमती सामान आपको दिखे  वह आप इस बोरी में डालते जाना शिष्य ने सोचा कि तो बड़े आराम से करूंगा।  यह काम तो बहुत आसान है क्योंकि मेरी बोरी तो खाली है।  जो कीमती सामान मिलेगा उसे मैं बोरी में भरता जाऊंगा ऐसा कहकर उसने गुरुजी से कहा ठीक है गुरु जी मैं ऐसा ही करूंगा। और दूसरा शिष्य जिसके पास सामानों से भरी बोरी थी क्योंकि उसमें वजन था इसलिए वह धीरे धीरे चल पा रहा था  क्यो कि उसमें खाने का सामान भरा हुआ था ।दोनों निकल पड़े थोड़ी दूर चलते ही खाली बोरी वाले शिष्य को एक कीमती पत्थर दिखा उसने उसे उठाकर अपनी बोरी में डाल दिया फिर थोड़ी दूर जाने पर उससे और भी कीमती पत्थर मिला वह बोरी में भरता हुआ चला गया। वह बोरी में जब अलग अलग चमकदार सुंदर कीमती पत्थर डाल रहा था तब उसकी बोरी वजन से बढ़ती जा रही थी। इतना दूर भी चलना था ।चलते चलते थक गया एक एक कदम अब तो मुश्किल से चला जा रहा था। दूसरी तरफ वह शिष्य जिसकी पूरी भरी हुई थी जैसे जैसे चलता गया और रास्ते में उसे जो भी जरूरतमंद मिलता गया उसने बोरी में से खाने पीने का सामान निकालकर उनको बांटता  गया और वह जिसको भी जरूरतमंद को खाने पीने का सामान बांट रहे थे उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे वह बहुत खुश थे।और धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उनका चलना भी आसान। जो बांटता गया उसका मंजिल तक पहुंचना आसान और सुखद होता गया और जो सिर्फ अपनी बोरी  में जमा ही कर रहा था वह वापस अपनी मंजिल तक पहुंचने में थक गया क्योंकि इतनी सारा सामान अपने बोरी में भरा था ।सभी शिष्यों ने देखा कि कौन सा शिष्य आसानी से अपनी मंजिल पर पहुंचा जो बांटता गया वह या जो जमा करता गया वह?  बताओ बच्चों कौन सा शिष्य गुरु जी के पास पहले पहुंचा?बिल्कुल  सही वही शिष्य जो सबको बांट रहा था। जो इकट्ठा करता गया वह तो थक चुका था और वापस अपनी मंजिल तक नहीं जा पाया। सभी शिष्यों ने देखा कि कौन मंजिल तक आसानी से पहुंच पाया और सभी शिष्यों को बात समझ में आ गई कि जो देता है वही सुख को पाता है ।क्योंकि असली मजा तो देने में है आप ही सोचिए बच्चों मंजिल तक आसानी से कौन पहुंच पाया जो देता गया वह कि जो बोरी भरता गया वह जीवन में हम भी इकट्ठा  करने की जगह बांटना सीखेंगे तो हमारा जीवन भी सुखी  और आसान हो सकता है। यह देने का गुण हमें एक अच्छा इंसान बनाता है जो भी इंसान किसी की भी किसी भी रूप में मदद करता है तो उसके चेहरे पर अगर उसके कारण मुस्कान आती है उसकी मुस्कान देखकर हमें जो खुशी मिलती है संतुष्टि का अनुभव होता है वह बहुत अनमोल होता है। तभी तो कहते हैं बच्चों जो देना सीखता है सबके साथ बैठता है वही अनमोल सुख को पाता है।
                                     🙏 धन्यवाद🙏                                    


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Wednesday, 22 April 2020

देखा देखी नहीं अपनी रुचि पहचाने फिर चुनें ।

सभी बच्चों की इंटरेस्ट अपने अपने होते हैं किसी को साइंस पढ़ने में मजा आता है तो किसी को मैथ्स पढ़ने में मजा आता है तो किसी की ड्राइंग बहुत अच्छी होती है ।अगर आपकी ड्राइंग अच्छी है तो आप एक अच्छे कलाकार बनेंगे ।साइंस पढ़ने में अच्छे हैं तो आप डॉक्टर इंजीनियर टीचर भी बन सकते हैं तो आपको अपनी काबिलियत और रूचि के अनुसार ही सब्जेक्ट का सिलेक्शन करना चाहिए। यही बात सोनाली आंटी ने अपनी बेटे  भी समझाई। कैसे आइए जानते हैं रोहन की कहानीसे 
Story..
 उन्होंने भी रोहन को समझाया की देखा देखी नहीं अपने हिसाब से ही विषयों का चुनाव करना चाहिए रोहित आठवीं क्लास का बच्चा बहुत अच्छा बच्चा। कभी भी स्कूल मिस नहीं करता था ।उसकी अटेंडेंस भी पूरी रहती थी। सारी टीचर्स उसकी  तारीफ करते थे क्योंकि रोज स्कूल जाना तो अच्छी बात है।  बच्चों 1 दिन रोहन के  स्कूल में अपने दो दोस्तों को बात करते हुए  सुना ।वह आपस में बात कर रहे थे कि हम बड़े होकर पायलट बनेंगे और आसमान में एरोप्लेन को उड़ाएंगे। उस दिन रोहन घर आकर अपनी मम्मी से कहा मम्मी  आपको पता है मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूं? माँ ने कहा नहीं बेटा आप ही मुझे बता दो कि आप  क्या बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? रोहन ने कहा नहीं मम्मी ऐसे नहीं बताऊंगा मैं आपको एक  हिंट देता हू।हूं  फिर आप बताना कि मैं बड़े होकर क्या बनना चाहता हूं मां ने का ठीक है । रोहन ने कहा मम्मा आप ध्यान से - आसमान में उड़ जाऊं दुनिया की में सैर कराऊ 
 हर कोई इस में बैठना चाहे मेरी संग संग सैर कराए।
 अच्छा बताओ बच्चों रोहन क्या बनना चाहता है बिल्कुल सही पायलट
       मम्मी ने कहा अच्छा तो तुम बड़े होकर पायलट बनोगे। रोहन ने कहा बिल्कुल सही मम्मा। उसकी माँ ने कहा चलो अभी तो तुम हाल फ़िलहाल हाथ मुंह धोकर खाना खाओ और पढ़ने बैठो रोहन ने कहा कि ठीक है मां 
 फिर कुछ दिनों के बाद रोहन ने अपनी क्लास के बाहर दो बच्चों को बात करते सुना कि हम तो सचिन तेंदुलकर जैसे बनेंगे ।बताओ बच्चों सचिन तेंदुलकर कौन है? बिल्कुल सही क्रिकेटर। वह दोनों बच्चे भी बड़े होकर क्रिकेटर बनना चाहते थे। और देश के लिए खेलना चाहते थे तब रोहन के मन में आया मैं भी क्रिकेटर बनूंगा ।उस दिन जब वह छुट्टी के बाद घर आया तोआते ही उसने अपनी माँ को कहा मम्मी आप बताएं कि मैं अब बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूं?माँ ने  पूछा बताओ बेटा आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? रोहन ने कहा ऐसे नहीं मां मैं आपको एक क्लू देता हूं चौके छक्के मैं हूं लगाता बैट बॉल को दूर भगाता ।
एक बार जो देखने आता हर चौक के छक्के पर शोर मचाता
मैंने कहा अच्छा तो आप बड़े होकर क्रिकेटर बनना चाहते हैं। पर कुछ दिन पहले तो आप आसमान की सैर करना चाहते थे पायलट बनना चाहते थे ।रोहन ने कहा पायलट बनना  कैंसल मम्मी मैं बड़ा होकर क्रिकेटर बनूंगा। मम्मी ने कहा ठीक है आप बड़े होकर भले क्रिकेटर बनना लेकिन इसके लिए आपको फिट रहना पड़ेगा टाइम पर खाना खाना होगा एक्सरसाइज करनी होगी। रोहन ने कहा हां हां हां मुझे पता है मैं खूब मेहनत करूंगा। सारे बच्चों को अपनी क्लास टीचर से लगाव होता है 1 दिन रोहन की क्लास टीचर बच्चों को क्लास में बड़े अच्छे तरीके से हिंदी की कविता पढ़कर सुना रही थी सारे बच्चे ध्यान से मस्त होकर उनकी कविता सुन रहे थे तब रोहन के मन में आया मैं भी अपनी टीचर की तरह बड़ा होकर एक टीचर ही बनूंगा उस दिन घर आकर उसने अपनी मां से कहा पता है ना मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूं  क्या बनना है आपको बड़े होकर।? अच्छा बताओ बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ऐसे नहीं मामा मैं आपको हिंट देता हूं
 पढ़ना लिखना सबको  सिखाऊं
 ज्ञान का प्रकाश फैलाऊ 
 जो भी मेरे पास है आता जीवन की सही राह को पाता
 बताओ बच्चों अब रोहन क्या बनना चाहता है  ?बिल्कुल सही   टीचर। उनकी मम्मी ने कहा अच्छा तो अब तुम टीचर बनना चाहते हो बेटा।ऐसी आप ना तो पायलट बन पाएंगे ना  टीचर बन पाएंगे ।आप तो गंगू की तरह काम कर रहे हो। मां कौन गंगू मा ने कहा तुम्हारा हाल भी गंगू के जैसा ही है। बताओ तो  मम्मा गंगू कौन है? बेटा वह गंगू एक किसान है जिसने अपने खेतों के लिए कुआं खोदना था ।और सही जमीन को सेलेक्ट नहीं कर पाया तो ना जाने उसने अपने खेत में कितने गड्ढे कर दिए । रोहन ने कहा  मम्मी  ठीक से बताओ। तब उसकी मां ने कहा गंगू किसान के खेत के पास कोई कुआं नहीं था ।उसे अपने खेतों को सीखने के लिए किसी दूसरे के कुए से पानी लाना पड़ता था ।तब उसने सोचा क्यों ना मैं भी अपने खेतों के पास कुआं खुदवा दूं तो उसने अपने खेत के पास कुआं खोदना चालू किया पहले उसने 5 फीट का गड्ढा खोदा लेकिन उसे पानी नहीं मिला फिर उसने थोड़ी दूर पर एक और खड्डा खोदना चालू किया वहां भी उसने 5 फुट तक खड्डे खोद डाला लेकिन फिर भी उसे पानी नहीं मिला फिर वह दूसरे दिन खेतों पर जा कर एक नई जगह पर जमीन में गड्ढा खोदना चालू किया। ऐसा करके गंगू किसान ने अपने खेत में 7-8 गड्ढे खोद डाले। फिर वह हार कर अपने सिर पर हाथ रखकर बैठ गया तभी गंगू किसान के चाचा जी खेत पर पहुंचे और उन्होंने देखा कि खेत जगह-जगह खुदा हुआ है और गंगू उदास एक जगह बैठा हुआ है तब चाचा जी ने पूछा गंगू यह क्या किया है इतने  सारी खड्डे क्यों खोद रहे हो? गंगू ने कहा मैं खेतों की सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए कुआं खोद रहा हूं पर देखो एक भी खड्डे में से पानी नहीं आ रहा चाचा जी ने कहा अगर तुमने सही जमीन का चुनाव करके एक ही जगह मेहनत की होती तो तुम को पानी मिल जाता ।गंगू ने कहा मैंने तो कितने सारे खड्डे खोदे हैं मैंने कितनी मेहनत तो की है फिर भी पानी नहीं आया।चाचा  जी ने कहा तुमने मेहनत तो अलग-अलग खड्डे खोदने की की है वही मेहनत एक ही जगह गड्ढे को खोजने में लगाते तो पानी आ जाता। चाचा जी ने कहा खेत के किनारे खड्डा खोदना कुए के लिए सही जगह है ।तुम अब इस किनारे वाले खड्डे को खोदना चालू करो फिर से। गंगू ने अपने चाचा जी से कहा अच्छा चाचा जी ठीक है मैं इस किनारे वाले खड्डे को खोदना चालू करता हूं। गंगू ने 5 फीट और खड्डा खोदा यानी अब 10 फुट की गहराई में उसे खोद डाला लेकिन फिर भी पानी नहीं आया। तो चाचा जी से कहा  10 फुट खोद दिया अभी पानी नहीं आया है चाचा जी ने कहा आज के लिए इतना काफी  है कल फिर आना सवेरे जल्दी और 10 फुट गहरा खड्डा और इसी खड्डे को करना। कितने फुट गहरा खोदने के लिए चाचा जी ने कहा बिल्कुल सही 20 फुट
        चाचा जी ने कहा कि जमीन के अंदर से 20 से 30 फुट की गहराई तक के खड्डे खोदने पर पानी आता है। अगले दिन फिर से उसने वही किनारे वाले खड्डे को 25 फुट तक हॉट डाला की मेहनत रंग लाई और जमीन से पानी निकल आया तब माँ ने रोहन से कहा तुम भी तो पहले गंगू जैसे ही कर रहे हो कभी कुछ बनना है कभी कुछ बनना है तुम्हें दूसरों के नहीं बल्कि अपने हिसाब से अपने जीवन के लक्ष्य को तय करना होगा और फिर उसी लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करने के लिए मेहनत करनी होगी। सही दिशा में सब उगाने का अच्छा अब मैं समझ गया अब मैं अपना एक ही लक्ष्य बना लूंगा उसी में सफल होकर दिखाऊंगा।
 तभी तो कहते हैं बच्चों कुछ भी चुनते समय सोचेंगे समझेंगे और करेंगे विचार तो मिलेगा सही रास्ता और मिलेंगे खुशियां अपार।
                                   🙏धन्यवाद 🙏                                      

Wednesday, 15 April 2020

सोचो समझो फिर करो चुनाव।

हां तो बच्चों बताओ जब हम मार्केट में अपने मम्मी पापा के साथ शॉपिंग करने के लिए जाते हैं जैसे हमें नए कपड़े खरीदने हैं तो हमें तो सिर्फ उसका कलर देखना होता है कि अरे यह बहुत अच्छा है मम्मा मुझे यह ले दीजिए ।पर हमारे मम्मी पापा हमारे कपड़ों के चुनावों में बहुत सावधानी रखते हैं कि कपड़ा कैसा है ?और उसका रंग जल्दी जाएगा तो नहीं। कपड़ा हमारे बच्चोंके  लिये  कंफर्टेबल है कि नहीं? साइज में बच्चों को आ रहा है कि नहीं ?।और रोजमर्रा के कामों में भी हम लोगों को कितनी सारी चीजों के लिए चुनाव करने पड़ते हैं ।सवेरे से ही चुनाव अगर मम्मी को सब्जी बनानी है तो सब्जी मंडी से भी अच्छी अच्छी सब्जियों को चुन चुन कर लाती हैं क्योंकि अगर चुनाव सही होगा ढंग से देखेंगे देख कर लेंगे तो चीज अच्छी मिलेगी।
 अच्छा बच्चों जैसे हम खेल खेलते हैं तो कई बार बच्चे बारी के चुनाव के लिए अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ करके ही चुनाव कर लेते हैं। लेकिन असल जिंदगी में सोच समझकर ही चुनाव करना चाहिए क्योंकि
कुछ भी करते समय अगर सोचेंगे समझेंगे करेंगे विचार लेगा सही रास्ता और खुशियां अपार
 कहा जाता है कि राइट सिलेक्शन ही हमें राइट डायरेक्शन की ओर ले जाता है यानी कि सही चुनाव तो सही दिशा।.....
              सोचो समझो फिर करो चुनाव।
Story...
     इसे समझने के लिए हम उत्कृष्ट मिलते हैं उत्कर्ष अपनी मम्मी के साथ मार्केट गया। स्कूल खुलने वाले थे उत्कर्ष को अपने स्कूल के लिए नया बैग चाहिए था ।मार्केट में बहुत भीड़ थी क्योंकि स्कूल खोलने वाले थे तो सभी बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ मार्केट आए थे। कोई टिफिन लेने आया था तो कोई कपड़े लेने आया था ।तो कोई बैग ने आया था ।सभी बच्चे अपनी अपनी जरूरतों के हिसाब से चीजों का चुनाव कर रहे थे ।सारे दुकानदारों के पास रंग-बिरंगे  बैग भी टंगे हुए थे ।उत्कर्ष मम्मी को हर दुकान की ओर दिखाते हुए कहता  मम्मी चलो यह देखो यहां पर बहुत अच्छा बैग लगा है। मुझे यही बैग ले  कर दो मम्मी प्लीज मुझे बैग लेकर दो। मम्मी कहती नहीं बेटा हम एक दुकानदार को जानते हैं वह हर बार हमें अच्छा बैग दिखाते हैं । हम वहीं से बैग लेंगे ऐसा सुनकर उत्कर्ष चुपचाप चलने लगा ।आख़िरकार मम्मी उत्कर्ष को एक पहचान वाले भैया की शॉप पर लेकर आई जहां पर बहुत भीड़ थी ।वहां पर बहुत सुंदर सुंदर बैग  थे उत्कर्ष सोच रहा था वाओ- मम्मी यह तो  सच में बहुत अच्छी शॉप पर लेकर आई है ।अब दोनों मम्मी और उत्कर्ष  बैग देखने लगे उत्कर्ष ऊपर से ही देख रहा था उसका चुनाव कर रहा था लेकिन मम्मी तो बैग  खोल कर देखती चेन खोल कर देख रही थी कि अंदर कितनी जगह है उत्कर्ष की सारी कॉपी किताबें आएंगी या नहीं ।और बेल्ट  कितनी मजबूत है कहीं कुछ दिन में टूट तो नहीं जाएगी। यह सब देखकर  ही उत्कर्ष के लिए बैग सेलेक्ट करना चाहती थी ।इतने में उत्कर्ष  स्पाइडर-मैन वाला बैग उठाया और मम्मी से बोला मम्मी मुझे यही बैग चाहिए। मम्मी ने बैग  उठा लिया और देखने  लगी मम्मी ने कहा उत्कर्ष बहुत सुंदर है। लेकिन इसमें तो एक ही चैन है आप अपना टिफिन बॉक्स और पेंसिल बॉक्स कहां रखोगे? इसके लिए तो अलग से जगह नहीं है आपको बैग जमाने में दिक्कत होगी। फिर उसने दूसरा बैग  लिया जिसमें बहुत सारी चैन  मम्मी को बोला देखो मम्मी इतनी सारी चैन लगी हुई है मुझे यह वाला बैग ले कर दीजिए।   कितने सारे पॉकेट है ।मम्मी ने कहा हां बैग में  जेब तो बहुत सारी है पॉकेट तो बहुत सारे हैं पर गौर से बैग  देखो उत्कर्ष इसके बेल्ट कितने पतले हैं जब आप अपने कंधो पर टांगेगे तो आपको बेल्ट चुभेगे और वजन ज्यादा होने के कारण यह जल्दी फट भी सकता है ।आपको ऐसा बैग देखो जिसके बेल्ट भी थोड़े मजबूत और आरामदायक हो। मम्मी की बात सुनकर उत्कर्ष ने सोचा एक बैग खरीदने में इतना सारा देखना पड़ता है इतनी बातें सोचने पड़ती है। यह सब तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था ।अब उत्कर्ष ने सारी बातों को ध्यान में रखकर बैग देखना शुरू किया आखिर कार मम्मी की मदद से उसने अपना बैग चुन लिया। यह बैग बहुत सुंदर था मम्मी जिस दुकान पर लेकर आई थी वह बहुत पुरानी दुकान थी मम्मी का उस दुकान पर विश्वास था। और वह बैग भी सही दाम पर मिल गया तो देखा बच्चों एक अच्छे बैग के लिए पहले सही दुकान का चुनाव करना पड़ा  कि हमें सामान कहां से लेना है। फिर उस चीज का चुनाव करना पड़ा जो सही हो आपने देखा बच्चों एक छोटे से स्कूल के बैग को खरीदने के लिए उत्कर्ष की मम्मी ने कितना सोचा। आखिर  उन्होंने सही चुनाव किया ताकि  उत्कर्ष को कोई प्रॉब्लम नहीं हो ।
 बच्चों इसी तरह हमारा जीवन भी है। हमें कई बार कई चीजों में सिलेक्शन करने होते हैं।  पर सोचने वाली बात यह है कि क्या हम कोई भी चुनाव यानी किसी भी चीज को सोच समझकर चुनते हैं।
      कुछ भी चुनते समय यदि सोचेंगे समझेंगे करेंगे  विचार।
 मिलेगा सही रास्ता और मिलेंगी खुशियां अपार ।
          हमें हमेशा सोच समझकर विचार करके ही चुनाव करना चाहिए ताकि हमने जो भी चुना हो वह वो एकदम सही हो।
                               🙏  धन्यवाद  🙏

Tuesday, 14 April 2020

कहानियां जो आपका नजरिया बदल दे।



जैसा कि आप सभी जानते हैं कहानियों का दौर बहुत पुराना है। दादी नानी की कहानियां हों, विक्रम बेताल की कहानियां हो या फिर रामायण-महाभारत की कहानियां। आज भी लोग इन्हें बड़े प्रेम सुनते और देखते हैं। ये न सिर्फ हमारा मनोरंजन करती हैं बल्कि हमारी सोच को भी नई नहीं दिशा देती हैं। हमें इनसे बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है। इन्हें देखकर हमें कभी हैरानी होती है तो कभी हंसी आ जाती है।
मेरा नाम है वंश थावानी और हम आपके लिए लेकर आ रहे हैं ऐसी कहानियां जिसमें बिल्कुल भी कल्पना या नकारात्मकता नहीं है। इन कहानियों से आपको प्रेरणा मिलेगी और कुछ सीखने को भी मिलेगा। आप ऐसी घटनाएं और उदाहरण अपने रोजमर्रा के जीवन में भी महसूस करते होंगे। तो जुड़े रहिए हमारे साथ, प्रेरणादायक और मनोरंजक कहानियां पढ़ने के लिए। जहां आपको कुछ सीखने को मिलेगा और आपको मजा भी आएगा।
                              🙏धन्यवाद🙏




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सोचो समझो फिर करो चुनाव
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देखा देखी नहीं अपनी काबिलियत पहचाने फिर चुने
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