Tuesday, 26 May 2020

मदद करो सबकी, अगर खुशियाँ पानी हैं जग की ।

People help others in every way
रिसर्च  बताती हैं कि जब हम किसी की मदद करते हैं तो हमारी खुशी तो बढ़ती ही है साथ-साथ  हमारी हैल्थ भी यानि सेहत भी अच्छी होती है और हमारा मूड भी अच्छा होता है। यह जरूरी नहीं कि आप किसी को कुछ सामान देकर या पैसे देकर ही मदद करें ।मदद करने की सोचें तो फिर आप किसी की भी मदद कैसे भी कर सकते हो। रोहन जानता था।रोहन एक छोटा बच्चा पाँचवी कक्षा  का बच्चा ।वो जब स्कूल के लिए निकला तो बारिश के दिनों में सड़कों पर थोड़ा पानी भर जाता है तो उसके घर और स्कूल के रास्ते में भी बारिश के कारण थोड़ा पानी भर गया। सारे लोग थोड़ा सा कूदकर उस पानी को पार करके आगे जा रहे थे। रोहन भी ऐसा ही कर रहा था लेकिन तभी रोहन ने देखा की एक बूढ़े अंकल भी कूदकर पानी पार करने की कोशिश कर रहे थे पर नहीं कर पा रहे थे ।तब रोहन ने कहा कि रुकिये अंकल। रोहन ने दाएं बाएं देखा और उसे सड़क के किनारे दो ईट नजर  आए उसने फटाफट दोनों ईट उठा  कर पानी के बीचो बीच रख दिया। फिर उस बुढ़े  अंकल को कहां आप आराम से इस पर पैर रखकर सड़क पार करें ।अंकल ने  ऐसा ही किया।तब उन्होंने आराम से और अब बिना कीचड़ में पैर रखकर सड़क के दूसरे किनारे आ गए ।आगे बाकी आने जाने वाले लोग भी ऐसा ही कर रहे थे  यानी ईट ऊपर पैर रखकर सड़क पार कर रहे थे। रोहन के इतने से काम के कारण सबको बहुत आसानी हुई ।किसी को भी कीचड़ में पैर रखकर रास्ता नहीं पार  करना था  या फिर कूदकर सड़क पार नहीं करनी थी। सभी आने जाने वाले ईटों के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ रहे थे ।देखा बच्चों रोहन ने सिर्फ थोड़ी सी समझदारी दिखाई और उस बूढ़े अंकल के बारे में सोचा तो  बाकी लोगों की भी  कितन  मदद हुई ।ऐसे ही हम अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग रूप से सबकी मदद कर सकते हैं ।अगर आपका कोई दोस्त आपको कहता है कि मुझे तुमसे बात करनी है एक प्रॉब्लम है। आप भले प्रॉब्लम का सलूशन ना निकाल पाए पर वह आपके पास आया है तो आप उसकी सारी बातें सुन तो  सकते हैं। आप उसे अपना समय दे इसकी पूरी बात सुने ।तो भी उसकी मदद  है। उसे बहुत खुशी मिलती है ।आप बताएं बच्चों जीवो की मदद भी कर सकते हैं आप बस उन जीवो को कोई तकलीफ ना दे ।कुछ बच्चे मस्ती में सड़क के कंकड़ पत्थर उठाकर जानवरों पर फेंक कर मारते हैं जो बिल्कुल भी सही नहीं है आप उनके साथ अच्छा व्यवहार करें आपका अच्छा व्यवहार ही उनकी मदत है ।ऐसे ही आप पर्यावरण का भी ध्यान रखकर सबके लिए अच्छा काम कर सकते हैं पेड़ पौधों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाना है ।यह भी उनके लिए एक मदद है आप जानवरों को कुछ खिला दे परिंदों के लिए दाना रखें पौधों को पानी दे फिर देखो आपको कितना सुकून मिलता है ।मदद का बहुत अलग-अलग रूप है कैसे जानते हैं हम अगली कहानी में कि हम किसी को अपनी बारी देकर भी उसकी मदद कर सकते है।
     
 Story 
              
 एक था बादशाह और उस बादशाह का था एक बेटा यानी कि राजकुमार राजा ने यह मन में सोचा था की जब उसका बेटा अच्छे से पूरे पढ़ाई कर लेगा यानी गुरुकुल से शिक्षा पूरी करके आएगा तब मैं अपने राज्य के हर जरूरतमंद की जरूरत पूरी करूंगा ।फिर एक दिन वह आया जब राजा बहुत खुश थे क्योंकि उनका बेटा पूरी शिक्षा लेकर राज्य में वापस आया था जिसकी खुशी में उस बादशाह ने ऐलान करवाया यानी की घोषणा करवाई अगले दिन से उसके राज्य में हर जरूरतमंदों की हर जरूरत पूरी की जाएगी पूरा राज्य में ढिंढोरा पिटवा या गया  कि जिसको जो कुछ भी चाहिए कल राज महल में आकर बता दे। उस राज्य के लोग तो बहुत खुश हो गए क्योंकि बच्चों हर व्यक्ति कभी ना कभी कोई ना कोई जरूरत होती ही है ।आर जब पता चले कि हमारी जरूरत पूरी होने वाली है तो खुशी तो होगी ही ।सब लोग अगले दिन का इंतजार करने लगे सोचने लगे कि हम राजा से यह कहेंगे। इस जरूरत को पूरा करने की मांग करेंगे। अगले दिन बादशाह के राज महल के बाहर बहुत लंबी लाइन लग गई बहुत सारी लोगों की भीड़ जमा हो गई मानो पूरा राज्य ही एक कतार में खड़ा था। उस लाइन में सबसे पीछे आदमी खड़ा था तभी उस आदमी के पीछे एक और आदमी आया उसने अपनी जगह उसे दे दी अब खुद सबसे पीछे हो गया भूत दिन भर ऐसा ही करता रहा जो कोई भी आता उसे अपनी जगह दे देते उधर राजा बारी बारी से सबकी जरूरतें पूरी करते जा रहे थे किसी ने कहा कि मुझे खेतों में पानी चाहिए ।किसी ने कहा कि मुझे अपना पक्का घर बनवाना है ।किसी ने कहा कि मेरे घर में बेटी की शादी करनी है उसमें आप मदद कर दीजिए। तो किसी ने कहा शाही वैद्य से मेरे बेटे का इलाज करवा दीजिए। जिस जिस को जो जो भी जरूरत थी सब ने बादशाह से  कहा और बादशाह ने उनकी जरूरतें भी पूरी की । सब लोग बादशाह की तारीफ  के साथ साथ उस व्यक्ति की भी तारीफ करते जा रहे थे जो सबको अपनी बारी देता जा रहा था ।यह बात बादशाह के कानों तक भी पहुंच गई पूरा दिन निकल गया और लोग अपनी जरूरत के हिसाब से वहां से लेते गए और चलते गए ।बहुत खुश थे कि आज हमको वह मिल गया जिसकी हमें जरूरत थी। पर उन अंकल को तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। कि लोग अपनी जरूरत पूरी करते जा रहे हैं और वह सबसे पीछे ही है ।बादशाह को जब यह बात पता चली उन्होंने उस व्यक्ति को राजमहल के अंदर बुलवाया उससे कहा कि भाई आपका नंबर तो कब का आ जाता और आप जो मांगते वह पूरी करके अब तक घर भी चले जाते तुम ही क्या कर रहे हो और ऐसा क्यों कर रहे हो ? तुम सुबह से पीछे खड़े लोगों को आगे आकर अपनी जगह देते जा रहे हो और खुद अभी तक पीछे खड़े हो ।व्यक्ति ने जवाब दिया बादशाह जो आप कर रहे हैं मैं उतना तो नहीं कर सकता पर मैं भी कुछ देने की इच्छा रखता हूं क्योंकि असली मजा तो देने में है ।आपके पास देने के लिए लोगों को शाही खजाना है पर मेरे पास लोगों को देने के लिए मेरी बारी ही है ।मैं हर बार  अपनी बारी किसी और को दे देता हूं मुझे भी थोड़ा सुकून मिलता है ।बादशाह उसकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ और वह सोच रहे थे अगर देने का गुण हो तो कुछ ना होते हुए भी हम बहुत कुछ दे सकते हैं ।मेरे पास तो देने के लिए बहुत कुछ है इसके पास तो कुछ भी नहीं था फिर भी इसके कारण लोगों की मांग थोड़ी जल्दी पूरी हुई। बादशाह ने उसी वक्त उसे अपने राज महल में अच्छा सा पद देकर उसे काम पर रख लिया ।तो देखा बच्चों हम सभी के पास दूसरों को देने के लिए कुछ ना कुछ होता ही है बस देने का गुण होना चाहिए। हमें देना सीखना चाहिए। क्योंकि असली मज़ा तो देने में हैं।
                                   🙏 धन्यवाद 🙏

असली मजा तो देने में है।
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बांटने से ही बढ़ती हैं खुशियां। 
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Tuesday, 19 May 2020

जो मिला है, उसी में खुश रहना सीखिए ।


पता है बच्चों हमारा मन कभी भी एक चीज मिलने पर संतुष्ट नहीं होता अगर एक चीज मिल जाती है तो हमारा मन हमारे आगे किसी दूसरी चीज की इच्छा रख देता है जैसे मान लीजिए आपके पास एक खिलौना है पर थोड़े दिन बाद जब बाजार में कोई नया खिलौना देखते हैं या फिर अपने किसी दोस्त के पास नया खिलौना देखते हैं तो हमारा मन उसे लेने के लिए कहता है पर हमें ऐसा नहीं करना चाहिए अगर हमें किसी चीज की जरूरत नहीं है तो सिर्फ दूसरों के पास देखकर किसी चीज को उसे लेने का सोचना सही बात नहीं जो भी हमारे पास है हमें उसी में ही खुशी ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए!
इसीलिए तो कहते हैं
           ''दूसरों को देख कर मन नहीं भटकाना है   
             जो मिला है उसी से आगे बढ़ते जाना है                   
                   और सफलता को पाना है''


हां तोबच्चों इसलिए हमें जितना मिला है उस में खुश रहना चाहिए ।और अगर हमारी किसी भी चीज को पाने की इच्छा है तो धैर्य रखना चाहिए यानी कि सहनशीलता । हमारी सहन करने की ताकत ही हमारा धैर्य है ।क्योंकि किसी भी काम को पूरा करने में समय लगता है और अगर काम में कभी रुकावट आती भी है तो भी हमें धैर्य  रखना चाहिए ।बच्चों किसानको देखो वह मेहनत करके खेत तैयार करता है फिर उसमें बीज बोता है।और पानी भी देता उसे फसल तैयार करने के लिए बहुत दिनों तक धैर्य रखकर खेत में काम करना पड़ता तभी तो उसे अच्छी फसल मिलती है।
               कबीर दास जी ने भी कहा है -
     धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय ।
     माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय ।    धीरज रखने से ही फल भी मिलते हैं ।माली चाहे एक बार में पौधे में सौ घड़े पानी डालकर सीच ले लेकिन फल तो सही मौसम में ही आएंगे ।इसलिए धैर्य रखना होता है ।व्यापारी लोग भी व्यापार में बहुत सा धन लगाकर व्यापार में मुनाफे का इंतजार करते हैं ।विद्यार्थियों के पास पढ़ाई का काफी बोझ रहता है उनके पास बहुत सी किताबें होती हैं वह भी अलग-अलग विषयों की उनमें बहुत सारे पन्ने भी होते हैं उन्हें 1 दिन में नहीं पढ़ा जा सकता। धैर्य पूर्वक रोजाना थोड़ा थोड़ा मन लगाकर पूरे साल पढ़ना होता है। तब जाकर हम उस विषय का पेपर देते हैं और पास होकर अगली कक्षा में जाते हैं। कभी कभी किसी काम को करने में रुकावट आती है अगर हम मुसीबत में धैर्य से काम लेते हैं तो हमारी समस्या का समाधान आसानी से हो जाता है ।मुसीबत पड़ने पर घबराना नहीं चाहिए और धैर्य रखकर काम में जुटे रहना चाहिए तभी हमारा काम पूरा हो सकता है ।धैर्य से सब कुछ सम्भव हो सकता है यह बात जय ने अपने परिवार से सीखी थी ।
जानते हैं जय की कहानी से

Story-

               जय अपनी मम्मी-पापा और दादा-दादी के साथ रहता था अभी उसने सेवंथ क्लास पास करके वह आठवीं क्लास में आया था। तब वह बाजार में अपने पापा के साथ नई क्लास की कॉपी और किताबें लेने गया उसे वहां पर एक नया बैग भी बहुत पसंद आ गया। बताओ बच्चों आप भी जब जाते हैं कोई सामान लेने जैसे आप भी गए कॉपी किताब लेने गए  और आपको भी एक बैग पसंद आ जाता है ।लेकिन आपका पहला वाला बैग भी बिल्कुल सही है तब आपको क्या करना चाहिए? बच्चों बिल्कुल सही अगर आपका बेग पुराना नहीं  लगता है तो हमें पुराने बैग को ही यूज करना चाहिए ।क्योंकि  कुछ भी नया जो पसंद आ जाए उसे देख कर ले लेना जबकि अभी हमें उसकी जरूरत भी नहीं है तो यह सही नहीं है। क्योंकि जो हमारे पास है वह पर्याप्त है तो बच्चों जय ने अपने पापा से कहा पापा जी मुझे यह बात बहुत अच्छा लग रहा है आप मुझे ले दीजिए। तब जय के पापा ने कहा पिछली क्लास में आपको हमने सबसे अच्छा नया बैग ले कर दिया था ।और वह अभी भी नया ही लगता है तो अभी तुम्हें इस बैग की जरूरत नहीं है ।धीरज रखो अगले साल तुमको हम फिर एक नया बैग ले कर देंगे ।
  जय बहुत समझदार बच्चा था । उसने मन में सोचा पापा बिल्कुल सही कह रहे हैं मेरा बैग बिल्कुल नया ही तो लगता है। और मेरा पेंसिल बॉक्स भी नया ही है और मेरे पास कलर्स भी हैं ।तो मैं इनको अभी नहीं लेता हूं उसने अपने पापा से कहा अभी मुझे पेंसिल बॉक्स और कलर्स नहीं चाहिए जब जरूरत होगी तभी लूंगा।
 पापा ने कहा ठीक है ।फिर जय नयी कॉपी किताबें लेकर खुशी से घर आया। और रोज स्कूल जाने लगा नहीं था। उसमें उसे बहुत मज़ा आ रहा था। कुछ दिन के बाद उसका एक ड्राइंग कंपटीशन था ।उसने अपनी मम्मी से कहा मामा आज मेरा ड्राइंग कंपटीशन है ।मां  कहा बेटा आपने ड्रॉइंग शीट्स ,कलर ,पेंसिल्स, पेंट ब्रश ,सब अपने अपने बैग में रख ली है ना - जय ने कहा हां मां मैंने सब अपने बैग में रख लिया है ।फिर जय स्कूल पहुंचा तो उसे पर्यावरण बचाओ के ऊपर एक पोस्टर बनाना था वह बहुत खुश हो गया। अरे वाह इस पर तो मैं  बहुत अच्छा पोस्टर बना सकता हूं। फिर उसने सारा सामान बैग से निकाला। अरे वह तो अपना हरा रंग घर पर ही भूल गया है अब क्या होगा पर्यावरण में पेड़ और उसकी पत्तियों में तो हारा रंग भरना है, तभी तो अच्छी सी सीनरी बनेगी ।सभी रंग है लेकिन हरा रंग तो पेड़ पौधों में भरना  जरूरी है।सभी रंग है लेकिन हरा रंग तो है ही नहीं वह तो घर पर ही रह गया है कंपटीशन चल रहा है तो आप किसी दोस्त से भी कोई रंग नहीं ले सकते। अब जय क्या करेगा पर्यावरण बचाओ के लिए सबसे जरूरी हरा रंग तो उसके पास है ही नहीं। जय उदास हो गया लेकिन अचानक से उसे अपने दादाजी का एक किस्सा याद आया कि कैसे दादा जी ने कहा था कि कभी भी किसी भी मुसीबत में डरना नहीं चाहिए धैर्य रखकर समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए। पता है बच्चों क्या हुआ था पिछले साल गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने दादा जी के साथ दादा जी के पुराने गांव गया था गांव जाने के रास्ते में बीच में एक नदी थी बताओ बच्चों नदी पार हम किसके ऊपर बैठकर कर सकते हैं कुल सही नाव में बैठकर तो वह भी अपने दादा जी के साथ नदी पार करने के लिए एक नाव में बैठा। अभी नाव कुछ दूर ही चली थी कि नाव में एक छेद हो गया था और नाव में छेद से पानी भरने लगा। नाव डूबने का खतरा लगा सबको। नाव पर बैठे बाकी लोग बोलने लगे अरे हमें तो तौरना भी नहीं आता क्या करें। जल्दी नाव चलाओ ना भैया जल्दी कुछ करो। तब जय के दादाजी ने कहा घबराओ मत धैर्य रखो सब लोग मिलकर अपने दोनों हाथों से नाव का पानी बाहर निकालो। दादाजी की बात सुनकर सबको लगा सही बात है बीच नदी में हम कुछ नहीं कर सकते। हमें करना भी नहीं आता सभी लोग नाव का पानी बाहर निकालने में जुट गए। कितना पानी छेद से अंदर आ रहा था फटाफट सारे लोग मिलकर दोनों हाथों से पानी बाहर निकाल रहे थे और नाव चलाने वाले भैया जिसे हम मल्लाह भी कहते हैं बहुत  जल्दी-जल्दी नाव चला रहे थे। नाव तेजी से आगे बढ़ रही थी। सबकी आधे घंटे की मेहनत से नाव किनारे आ लगी। इस प्रकार धैर्य रखकर सभी लोगों की जान बच गई। धैर्य रखने से बड़ा से बड़ा खतरा भी टल जाता है जय के दादाजी ने सब को कहा किसी भी परेशानी में ऐसे ही धीरज रख कर समाधान ढूंढने से मंजिल में पहुंचने में आसानी होती है। तब जय को लगा मैं भी हार नहीं मानूंगा मुझे भी कुछ इसके लिए सोचना चाहिए मैं अपना कंपटीशन पूरा दूंगा और जरूर करूंगा। वह सोचने लगा कि वह क्या करें तभी उसे याद आया कि अरे एक बार ड्रॉइंग की क्लास में ड्राइंग टीचर ने सिखाया था कि अगर पीला और नीला रंग आपस में मिलाते हैं तो वह हरा रंग बन जाता है। फिर क्या था जय के चेहरे पर थी बड़ी वाली मुस्कान उसने जल्दी से पीला और नीला रंग आपस में मिलाया और बन गया हरा रंग उसने फटाफट सुंदर से पेड़ों में रंग भरा और अपना पोस्टर पूरा किया। देखा बच्चों हमारे पास जो है हम उसी में से ही सफल हो सकते हैं ।अगर जय यह सोचता कि मेरे पास हरा रंग तो है ही नहीं तो फिर मैं कैसे पर्यावरण बचाओ का पोस्टर पूरा कर सकता हूं तो वह इतना अच्छा पोस्टर नहीं बना पाता। उसने धीरज रखा और अपना ड्राइंग कंपटीशन पूरा किया इसलिए तो कहते हैं ना कि हमारे पास जो है वह बहुत खास है उसमें भी हम अपना काम पूरा कर सकते हैं बस हमें थोड़ा चेहरे की और उसे समझने की जरूरत होती है।
                               🙏धन्यवाद 🙏


असली मजा तो देने में है।
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बांटने से ही बढ़ती हैं खुशियां। 

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Tuesday, 12 May 2020

जो मिला है, बहुत मिला है।

INTRODUCTION :

छुक-छुक छुक-छुक चलती रेल गाड़ी,
        कभी यहाँ तो कभी वहां है, चलती रेल गाड़ी!
        दादा ji  के यहाँ भी जाती, नाना ji  के यहाँ भी जाती,
        छुक-छुक छुक-छुक चलती रेल गाड़ी !

आज तो दीपू बना था रेल गाड़ी का इंजन और सोनु ,चिटु और बिटु बने थे इसके ड़िबे ये सारे बच्चे एक दूसरे के पीछे, एक दूसरे के कपड़े पकड़ते हुए रेल गाड़ी का खेल खेलते थे कभी सोनू इंजन बनता तो कभी चिटू ऐसे करते करते सभी बच्चे  इंजन बनने का मजा लेते लेकिन इनमें से एक बच्चा राजू जो हमेशा गारड़ बनता था, और उन्हे रोकने के लिए लाल  झड़ी व चलने के लिए हरी झड़ी दिखाया करता था, वह  बस साइड में खड़ा होकर  उनके खेल को देखता  और उस खेल का हिस्सा बनता था,और वहीं पा8स के मकान में मानव रहता था वह बहुत दिनों से ईन बच्चो का यह खेल देख रहा था वह देखता कि कभी कोई बच्चा  इंजन बना है, तो कभी कोई बच्चा , सभी बच्चे इंजन बनने का मजा भी लेते और ड़िबे बनने का भी बस एक ही बच्चा था जो रोज गार्ड बनता था यह बात मानव को समझ नहीं ,आई फिर अगले दिन जब वह सारे बच्चे रेल गाड़ी का खेल, खेल रहे थे तब भी वही बच्चा गार्ड बना था ,अब तो मानव से रहा नहीं गया मानव  उन बच्चों के पास गया उनका खेल देखने लगा और जैसे ही उन बच्चों ने अपना खेल खत्म किया तो मानव उस गार्ड बच्चे के पास गया और उससे उसका नाम पूछा कि आपका नाम क्या है? उसने कहा 'राजू ' तब मानव ने पूछ ही लिया कि राजू  आप रोज इन बच्चों के साथ यह रेल गाड़ी का खेल खेलते हो मैं  आपको देखता हूँ पर मुझे यह समझ नहीं आता कि राजू  आप ही रोज गार्ड क्यो बनते हो!क्या आपको  इंजन और ड़िबे बनना अच्छा नहीं लगता है या ये बच्चे  आपको बनने नहीं देते तब राजू ने बहुत ही मासूमियत से कहा'' भैया ऐसा नहीं है मुझे भी कभी  इंजन तो कभी ड़िबे बनने का मन करता है भैया वह ऐसा होता था न की जब पहले हम खेल शुरू करते थे तो हमें यह सोचने में बहुत समय लग जाता था की कौन इंजन बनेगा कौन डिब्बा बनेगा और कौन गार्ड बनेगा ऐसा तय करते करते कितनी ही बार तो खेल का समय ही निकल जाता तब हम खेल भी नहीं पाते थे तब एक दिन मैंने सोचा की क्यूँ ना मैं ही हमेशा गार्ड बन जाऊं ताकि हम खेल को सही समय पर शुरू कर दे और खेल को ज्यादा देर तक खेल भी पायें और भैया आपको पता है गार्ड बनना कितना अच्छा होता है  क्योंकि गाड़ी को कण्ट्रोल  करने की  सारी ताकत तो गार्ड के पास ही होती है गार्ड ही तो होता है जो रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाकर आगे जाने देता है और लाल झंडी दिखाकर गाड़ी को रोक भी सकता है, इसीलिए मैं गार्ड बनता हूं और हम सब खेल भी पाते है और मज़े भी कर लेते है राजू की बातें सुनने के बाद मानव ने सोचा कि राजू की इन बातों में कितनी बड़ी बात छुपी हुई है कितना बड़ा खुशियों का खजाना छुपा हुआ है खेलते समय राजू का मन भी कभी इंजन या कभी डिब्बे बनकर खेलने का करता था पर फिर गार्ड बनने के लिए कोई भी बच्चा तैयार नहीं होता था और वे सब खेल नहीं पाते थे इसलिए उस खेल में राजू हमेशा गार्ड बनता था पर फिर भी वह खुश रहता था क्युकी जो पार्ट उसे उस खेल में मिला था वह उसी में खुश रहता था तब मानव ने सोचा, “ सब सही कहते है की जो भी हमारे पास है वह कितना खास है  उनमें भी तो खुशियां हैं बस जरूरत होती है हमें उसमें अपनी खुशी ढूंढने की जो भी हमारे पास होता है यानी कि जो भी हमें प्राप्त है वह अपने आप में पर्याप्त है जरूरत होती है हमें उसको समझने की उसको महसूस करने की इसीलिए तो कहते हैं!
                   ''दूसरों को देख कर मन नहीं भटकाना है                     जो मिला है उसी से आगे बढ़ते जानाहै
                   और सफलता को पाना है'

और बच्चो आज हम बात करेंगे इसी बारे में कि'' जो प्राप्त है वही पर्याप्त है '' मतलब की जो हमें मिला है जो भी हमारे पास है वही हमारे लिए पर्याप्त होता है बस  जरूरत होती है हमें उसमें अपनी खुशी ढूंढने की

Story-1 


           आकांक्षा अपने परिवार के साथ रहती थी । जिसमें आकांक्षा के मम्मी पापा  बड़ी बहन और एक बड़ा भाई था।आकांक्षा का परिवार एक साधारण परिवार था। आकांक्षा  छोटी थी लेकिन पढ़ने में बहुत होशियार थी ।इस साल आकांक्षा ने 5th पास की और जिस स्कूल में वह पढ़ती थी वह 5th तक ही था  तो उसे स्कूल में एडमिशन लेना था।तो आकांक्षा के बड़े भाई ने अपने पापा से कहा कि पापा आकांक्षा पढ़ने में बहुत अच्छी है तो क्यों ना इसका एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में करवाया जाए। पापा ने कहा हां बात तो ठीक है। फिर पढ़ाई में होशियार होने के कारण आकांक्षा को एडमिशन भी मिल ही जाएगा। आकांक्षा के पापा ने उसका ऐडमिशन एक बड़े स्कूल में करवाया । क्योंकि वह पढने में होशियार थी तो उसका ऐडमिशन आसानी से हो गया। अच्छा स्वभाव होने के कारण वो नए स्कूल में सारे बच्चों के सा अच्छे से घुल मिल गई थी। उसे अपना नया स्कूल और वहां की सारी टीचर काफी अच्छी लग रही थी। वैसे तो सभी विषयों यानी सब्जेक्ट की टीचर के साथ सारे बच्चों को बहुत प्यार था पर सिक्स क्लास की पूनम मैडम से सभी बच्चे बहुत प्यार करते थे। वह उनकी क्लास टीचर थी और वह नैतिक शिक्षा यानी मोरल साइंस का विषय पढ़ाती थी जिसमें हमें अच्छी-अच्छी बातें प्रेरणादायक कहानियों के साथ सिखाई जाती हैं जैसे इमानदारी, आत्मविश्वास, शिष्टाचार, परिवार और समाज की वैल्यू। तो आज जो पाठ पूनम मैडम पढ़ाने वाली हैं उसका विषय है जो प्राप्त है वही पर्याप्त है। पूनम मैडम ने कहा कि हमें जो कुछ भी भगवान ने दिया है बहुत दिया है हमें उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए किसी से कभी तुलना नहीं करनी चाहिए।
फिर पूनम मैडम ने सुकरात की कहानी सुनाने लगी जो कि उस पाठ में थी। यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात की कहानी। सुखराम एथेंस के बड़े विद्वान थे सुकरात जी बड़े सरल और प्रेमी स्वभाव के थे और हमेशा सत्य चिंतन में इतने व्यस्त रहते थे की उन्हें खाने पीने की भी याद नहीं रहती थी। वह जहां भी थोड़े लोगों को एक साथ बैठा देखते तो ज्ञान की चर्चा करने लगते। एक बार सुकरात अपनी शिष्य मंडली के साथ ज्ञान की बातों में व्यस्त थे तभी वहां घूमते घूमते एक आदमी आया। उन्होंने सुकरात और उनके शिष्यों के बीच जाकर कहा की मैं चेहरा देखकर व्यक्ति के बारे में बता सकता हूं कि यह इंसान कैसा है। सुकरात क्योंकि देखने में सुंदर नहीं थे लेकिन लोग उन्हें उनके सुंदर विचारों और सुंदर मन के कारण बहुत अधिक पसंद करते थे, उस आदमी ने सुकरात को देखकर कहा की आपकी बड़ी बड़ी चौड़ी नाक देख कर लगता है कि आपके अंदर क्रोध की भावना प्रबल है। यह सुनकर सुकरात के शिष्य नाराज हो गए लेकिन सुकरात ने आदमी को को अपनी बात पूरी करने का मौका दिया। आदमी ने आगे कहना चालू किया। उन्होंने कहा आपका माथा देख कर लगता है कि आप निश्चित रूप से एक लालची इंसान होंगे। आपके चेहरे की बाकी बनावट देख कर लगता है कि आप देश हित के लिए नहीं सोचते होंगे। यह सब सुनकर सुकरात ने उस आदमी को इनाम देकर भेज दिया। यह देख कर सुकरात के शिष्य हैरान रह गए उन्होंने सुकरात से पूछा की आपने ऐसा क्यों किया? उन्होंने सब तो गलत बताया। सुकरात ने मुस्कुराकर कहा हो सकता है की मेरे अंदर यह सब कमियां थोड़ी बहुत हो और मैं यह जानता हूं कि भगवान ने मुझे शारीरिक रूप से सुंदर नहीं बनाया है। बस वह आदमी एक बात बताना भूल गए कि भगवान ने मुझे विवेक शक्ति भी दी है जिसके कारण मैं इन सारी बुराइयों पर अंकुश लगाकर रखता हूं ।भगवान ने मुझे मस्तिष्क तो अच्छा दिया है मेरे विचार तो अच्छे दिए हैं जिसके लिए मैं भगवान का हर पल शुक्रिया अदा करता हूं की जिसके कारण मैं इतना ज्ञान अर्जित कर पाया तो क्या हुआ अगर मेरे पास सुंदर शरीर नहीं सुंदर मन और मस्तिष्क तो दिया है इसलिए जो प्राप्त है वही पर्याप्त है। हमें उसी में ही खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए कि उसके पास तो यह है उसके पास वह है हमारे पास नहीं है। पहले देखो तो आपके पास भी बहुत लोगों से बहुत ज्यादा है यानी जो दिया है भगवान ने बहुत दिया है। फिर पूनम ने कहा इसलिए बच्चों हमेशा जो मिले उसके लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए। पूनम ने बच्चों से कहा बच्चों आपको कुछ पूछना है इस पाठ में से तो पूछो तभी एक बच्चे ने कहा मैडम मेरे मम्मी पापा हमेशा मुझे डांटते रहते हैं तो इस बात का शुक्रिया कैसा सपना मैडम ने कहा शुक्र करो आपके माता पिता तो आपके साथ है वह आपके सच्चे दोस्त हैं आपके शुभचिंतक है और उन्हें आपकी काबिलियत पर भरोसा है तभी तो आप की गलतियों और असफलताओं पर आप को डांटते हैं समझाते हैं ता कि वह गलती दोबारा ना करें फिर दूसरे बच्चे ने कहा स्कूल में टीचर मुझे टेस्ट में कम नंबर आने पर डांटते हैं तो इस बात का कैसा शुक्रिया तब पूनम ने कहा शुक्र करो कि आपको पढ़ाई का मौका मिला है आपको अच्छे टीचर मिले हैं जो आपके हितेषी हैं आपसे अच्छे रिजल्ट की उम्मीद रखते हैं तभी तो कम नंबर आने पर डांटते हैं ताकि आप आगे से और अच्छा पढ़ें। फिर एक बच्चे ने कहा कि मैं एक अच्छा खिलाड़ी हूं लेकिन मुझे खेल के मैदान में हमेशा एक्स्ट्रा प्लेयर यांत्रिक खिलाड़ी बना कर बाहर बैठा देते हैं टीम में शामिल नहीं करते तो इस बात का कैसा शुक्रिया ।तब पूनम ने कहा शुक्र करो कि आप एकदम स्वस्थ है कोई भी खेल खेल सकते हैं और आप टीम के लिए एक्स्ट्रा प्लेयर तो हो आप में अच्छे खिलाड़ी की संभावना को देखते हैं एक दिन टीम में आपको जरूर जगह मिलेगी। क्यों क्योंकि आप लेयर तो हो अच्छे आप अच्छे खिलाड़ी हैं फिर एक बच्चे ने कहा कि मुझे घर पर सारे छोटे बड़े काम सब लोग मुझसे करवाते हैं क्योंकि मैं घर में छोटा हूं तो फिर रिश्ता कैसा शुक्रिया पूनम मैडम ने कहा अरे शुक्रिया करो घर वाले तुम्हें इस लायक समझते हैं और फिर तुम्हें बुद्धिमान समझते हैं और बिना काम के तो जीवन नहीं होता आप काम सीखे मेहनती  बने फिर एक और बच्चे ने कहा मैडम मैं जब भी टीवी देखता हूं तब मेरा बड़ा भाई मुझसे रिमोट लेकर डांटता है कि इतनी टीवी नहीं देखते त पुणे मैडम ने कहा इसका भी शुक्रिया करो क्योंकि तुम्हारे बड़े भाई को तुम्हारी सेहत और आंखों की सुरक्षा का ख्याल है क्योंकि ज्यादा देर तक टीवी नहीं देखनी चाहिए सब लोगों को बच्चों को समझ आ गया कि हमें जो भी मिला है उसका शुक्रिया करना चाहिए फिर उसके बाद पूनम मैडम क्लास के बाहर चली गई फिर कुछ दिनों के बाद शिक्षक दिवस यानी टीचर डे आने वाला था सभी बच्चों ने कहा हम सुंदर सुंदर ग्रीटिंग कार्ड खरीद कर लाएंगे और अपनी सभी टीचर्स को देंगे बच्चों बताओ टीचर्स डे कब और क्यों मनाया जाता है बिल्कुल सही 5 सितंबर को टीचर्स डे मनाया जाता है हमारे देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉक्टर सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है वह खुद भी बहुत अच्छे शिक्षक थे इस दिन शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है सभी बड़े खुश है कि कितना मजा आएगा टीचर्स डे पर आकांक्षा फिर वापस आई थोड़ी चिंता में थी उसकी बड़ी बहन ने पूछा क्या हुआ आकांक्षा क्या सोच रही हो आकांक्षा ने कहा दीदी अगले हफ्ते शिक्षक दिवस आ रहा है सारे बच्चे बाजार से ग्रीटिंग कार्ड खरीद कर टीचर्स को देने वाले हैं पर मेरे पास तो इतने पॉकेट मनी नहीं है कि मैं सारी टीचर्स के लिए ग्रीटिंग कार्ड खरीदें तब आकांक्षा की दीदी ने कहा बस इतनी सी बात कोई बात नहीं अगर  आप कहां से नहीं खरीद सकते किसी ने कहा थोड़ी की बाहर से ही खरीद कर दो यही तो भाव है और हमारे पास जितना है काफी है तुम खुद से अपने हाथों से बहुत सुंदर सुंदर ग्रीटिंग कार्ड बनाकर अपनी टीचर्स को दे सकती हो तब आकांक्षा ने पूछा दीदी किससे बनाऊं मैं कार्ड दीदी ने कहा हमारे पास शादी के इन्विटेशन के कितने सारे पुरानी कार्ड पड़े हैं तुम उनमें से बाहर की कवर को लेकर सुंदर फूलों की की कटिंग करके उस पर चिपका कर ग्रीटिंग कार्ड बना सकती हो और किसी पर अपने ड्राइंग शीट लेकर कुछ अच्छा सा पेंट करके भी ग्रीटिंग कार्ड बना सकती हो और किसी कार्ड पर सितारे मोती चिपकाकर भी बहुत सुंदर ग्रीटिंग कार्ड बना सकती हो आकांक्षा तो यह सुनकर बहुत खुश हो गई कि हां दीदी यह तो बहुत अच्छा आईडिया है मैं जल्दी से जाकर सारे पुराने शादी समारोह  के कार्ड लेकर आती हूं और मैं बहुत सुंदर कार्ड बनाऊंगी उसके बाद आकांक्षा कार्ड बनाने में जुट गई उसने बहुत सुंदर सुंदर कार्ड बनाए आकाश के अंदर अपनी टीचर्स के लिए बहुत अच्छे अच्छे वाक्य भी लिखें टीचर्स डे पर उसमें वह सारे के सारे ग्रीटिंग अपनी टीचर्स को दिए उसकी ग्रीटिंग कार्ड सबसे अलग थी क्योंकि वह कार उसने हाथों से मेहनत करके बनाए थे सारी टीचर्स को बहुत पसंद है उसे भी बहुत खुशी हुई तो देखा बच्चों किसी भी काम के लिए बहुत सारे संसाधनों की जरूरत नहीं होती है हमारे पास जितना है हम उससे भी बहुत कुछ कर सकते हैं जो हमारे पास है उस में खुश रहना है जो अगर थोड़ा बहुत नहीं है उसकी शिकायत नहीं करनी है हम उतने में ही अच्छा सोचेंगे अच्छी कल्पना करेंगे और अच्छे भाव रखेंगे तो जरूर हर काम में सफल होंगे और ढेर सारी खुशियां मिलेगी तो बच्चों दूसरों को देख कर मन नहीं भटका ना है जितना मिला है उसमें ही खुशियों को पाना है और आगे बढ़ते जाना है। 
                               🙏 धन्यवाद 🙏


असली मजा तो देने में है।

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बांटने से ही बढ़ती हैं खुशियां।

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Tuesday, 5 May 2020

बांटने से ही बढ़ती हैं खुशियां।


 INTRODUCTION:

इंसान सारे काम अकेले नहीं कर सकता कभी ना कभी उससे किसी न किसी की मदद की जरूरत होती ही है अगर सब सिर्फ अपनी नहीं दूसरों की भी सुख सुविधाओं और उनका ध्यान रखते हैं तो यह समाज बहुत तरक्की करता है इसलिए हमें सिर्फ अपने बारे में ही नहीं दूसरों के बारे में भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का अच्छा ना लगे हमेशा उनकी मदद करने का ही काम करना चाहिए। किसी भी प्रकार से उनको सुख मिले हमें यही सोचना चाहिए। बच्चों महात्मा गांधी जी कौन है? हां हमारे देश के राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। बच्चों महात्मा गांधी भी जो कुछ भी उनके पास होता था उसके उपयोग को लेकर बहुत ध्यान रखते थे। उनके पास जो भी चीज होती थी जरूरत से ज्यादा वह दूसरों को बांट देते थे यहां तक कि अगर काम के बाद अगर पानी बच जाता था तो भी वह पानी फेंकते  नहीं थे कि वह काम आएगा किसी और को दे सकते हैं यही सोच कर पानी को भी संभाल कर रख लेते थे। पता है बच्चों एक बार महात्मा गांधी जी को किसी काम से बंगाल जाना था। तो रेलवे ने उनके लिए एक पूरा डिब्बा आरक्षित किया यानी कि रेलगाड़ी के डिब्बे में उनकी और उनके साथ जाने वाले लोगों को कोई तकलीफ ना हो इसे उनके लिए एक पूरी बोगी निर्धारित की गई। ताकि वह आराम से यात्रा कर सकें ठीक से।जिस समय जिस दिन उनको जाना था तो यात्रा आरंभ हुई। गांधीजी ने देखा कि उनके लोग और उनका सामान तो एक ही डिब्बे में बड़े आराम से आ गए हैं उन्होंने यह भी देखा कि बाकी डिब्बे में यात्री जो सफर कर रहे थे उस ट्रेन में जरूरत से ज्यादा थे उनको तो ठीक से बैठने की जगह भी नहीं थी। वह कठिनाई से पास पास बैठकर कष्ट के साथ यात्रा कर रहे थे। गांधी जी ने टी सी को बुलवाया और कहा कि अपनी यात्रा बड़े आराम से एक  साइड सीट पर बैठकर ही कर सकते हैं ।हम लोगों को बाकी सीटें दूसरे यात्रियों के लिए खाली कर देना चाहिए। यह सीटें  हम उनको आराम से बैठने के लिए देंगे ताकि बाकी लोग भी सुविधा के साथ यात्रा कर सकेंगे। गांधी जी से यह सुनकर उन्होंने कहा जिन्होंने यात्रा का प्रबंध किया था कि आप तो रेलवे को पहले ही इस सारी बोगी का किराया दे चुके हैं अगर आप यह सीट किसी और को भी देंगे तो आपको रुपया वापस नहीं मिलेगा और आपको कठिनाई भी हो सकती है। ऐसा सुनकर महात्मा गांधी जी ने कहा भले किराया ना मिले यह जरूरी नहीं है लेकिन दूसरे डिब्बे में क्षमता से अधिक यात्री बैठे हैं आराम से बैठ भी  नहीं पा रहे हैं ।तो हमें जरूरत से ज्यादा जगह लेने का अधिकार नहीं है। वह भी हमारी तरह नागरिक हैं हमारे बंधु है हमारे पास जगह ज्यादा है तो हमें उनको देना चाहिए। तब फिर उन्होंने अपना एक साइड की पूरी सीटें खाली कर दी और उनको आने दिया जो खड़े होकर यात्रा कर रहे थे डिब्बे में ।तो देखा बच्चों महात्मा गांधी जी ने भले किराया उनको वापस नहीं मिला वह आराम से सो कर अपने साथियों के साथ जा सकते थे लेकिन नहीं उन्होंने देखा कि बाकी डिब्बे में लोग आराम से नहीं बैठ पा रहे हैं और कुछ यात्री खड़े हैं तो उन्होंने उन को जगह दी भले उसका किराया उन्हें वापस नहीं मिला वहां आराम से सो कर भी अपने साथियों के साथ यात्रा कर सकते थे पर उन्होंने अपनी जगह दी। और जो भी वहां आकर बैठे यात्री वह बहुत खुश थे और उन्होंने महात्मा गांधी जी को दिल से धन्यवाद दिया ।तो देखा बच्चों हमें भी उनकी तरह सब के बारे में सोचना चाहिए आप किसी की किसी भी रूप में मदद कर सकते हैं उन्होंने खड़े यात्रियों को आराम से बैठने की जगह दी वह भी खुश और उनको देखकर महात्मा गांधी जी भी खुश तो बच्चों असली मजा तो देने में है।

STORY

        आदित्य को भी इसी सुख और संतुष्टि का अनुभव हुआ जब वह 11 साल का था आदित्य के जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि आदित्य को इस बात का एहसास हुआ की देने में कितना सुख और कितनी खुशी है। एक दिन आदित्य ने देखा कि उसकी कॉलोनी में सर्कस लगी है। तब उसने अपने पापा से कहा पापा हमारे यहां से सर्कस लगी हुई है आप मुझे भी सर्कस दिखाने ले चलिए। तब उसके पापा ने कहा ठीक है बेटा जिस दिन भी मुझे छुट्टी मिलेगी मैं आपको सर्कस दिखाने जरूर ले चलूंगा। एक-दो दिन के बाद उसके पापा को ऑफिस से छुट्टी मिली तब उन्होंने आदित्य से कहा आज समय से तैयार हो जाना आज हम सर्कस देखने चलेंगे। आदित्य तो खुश हो गया अरे वाह' कितना मजा आएगा आज तो मै सर्कस देखने जाऊंगा फिर आदित्य तैयार हो गया अपने पापा के साथ सर्कस देखने के लिए। आदित्य जब अपने पापा के साथ उस जगह पर पहुंचा जहां सर्कस लगी हुई थी तब उसके पापा टिकट खरीदने के लिए लाइन में खड़े हो गए कुछ लोग पहले से ही लाइन में खड़े थे उनका भी नंबर आने वाला था। आदित्य के पापा के पहले टिकट के लिए एक परिवार खड़ा था जिसमें एक अंकल और उनके तीन बच्चे हैं साफ नजर आ रहा था कि वह साधारण परिवार के हैं ।उनके कपड़े भी बहुत साफ-सुथरे नहीं थे लेकिन उनका व्यवहार बहुत अच्छा था ।वह शांति से अपनी टिकट लेने की बारी का इंतजार कर रहे थे और तीनों  बच्चे उत्साह के साथ एक दूसरे से बातें कर रहे थे कि उन्हें अंदर सर्कस में जोकर हाथी बंदर और बहुत सारे परिंदे भी देखने को मिलेंगे और अलग-अलग में करतब देखने को भी मिलेंगे। उनकी बातें सुनकर मानो ऐसा लग रहा था कि वह पहली बार सर्कस देखने जा रहे हैं अब उनकी टिकट लेने की बारी आ गई थी तब टिकट चेक नहीं पूछा आपको कितनी टिकट चाहिए तब उन्होंने जवाब दिया सर चार टिकट चाहिए एक मेरी बाकी तीन बच्चों की। मैं अपने पूरे परिवार को सर्कस दिखाने लाया हूं उन्होंने बड़े गर्व से कहा ।तभी टिकट काउंटर की भैया ने कहा कि आपको कौन सी क्लास का टिकट लेना है 3 क्लास के टिकट है? आपको कौन सी क्लास दे ? सबसे महंगा है बालकनी फिर उसके बाद फैमिली और फिर जनरल ।जो कि सस्ती है आपको कौन सी टिकट दे दे ?उसने कहा भाई साहब आप मुझे 4 टिकट जनरल  क्लास की दे दीजिए । टिकट वाले भैया ने चारों टिकट के पैसे जोड़कर बताएं पैसे सुनकर उनके चेहरे से मुस्कान ही चली गई। फिर उन्होंने खिड़की की तरफ झुकते हुए फिर से पूछा भाई साहब कितने पैसे बताया आपने टिकट क्लर्क में फिर से पैसे बताएं फिर अंकल को याद आया कि उनके पास तो इतने पैसे हैं ही नहीं। वह मन ही मन सोच रहे थे कि बच्चों से क्या कहेंगे वह खिड़की के काउंटर से बाहर आ गए बिना टिकट लिए। आदित्य के पापा यह देख रहे थे और उन्होंने समझ लिया था की पैसे की वजह से यह टिकट नहीं ले रहे हैं और बच्चों का बहुत मन है सर्कस देखने का तब उनको लगा कि क्यों न उन बच्चों के लिए हम टिकट लेकर दे दे लेकिन आदित्य के पापा ने सोचा ऐसे तो यह  टिकट लेंगे नहीं किसी से भी। तो क्या करना चाहिए ?तब आदित्य के पापा को  एक आईडिया आया। उन्होंने फटाफट सेेेे टिकट काउंटर से 6 टिकट ली 4  अंकल की फैमिली के लिए और 2 टिकट  अपने लिए। उन्होंने फैमिली क्लास की टिकट खरीदे थे ।तो वह  जल्दी से उन अंकल के पास गए और कहां  आप यह  चार टिकट ले लीजिए। अंकल ने कहा  नहीं मैं कैसे ले सकता हूं?तब उन्होंने कहा हमारी तो लकी ड्रॉ स्कीम में चार टिकट और फ्री मिली है और हम लोग तो सिर्फ दो हैं और तो कोई साथ नहीं है  हमारे लिए तो वैसे भी टिकट बेकार होने वाली है इससे अच्छा है आप बच्चों को सर्कस दिखा दे फ्री जो मिली है हमको।  उन अंकल ने आदित्य के पापा से पूछा सच यह टिकट आपको फ्री है? आदित्य के पापा ने कहा बिल्कुल फ्री में मिले हैं लकी ड्रॉ कूपन में मिले हैं हमको। वह किसी से मदद नहीं मांग रहे थे ।पर हालात लग रहे थे कि उनके बच्चे सच में सर्कस देखने के लिए बहुत एक्साइटिड है। उस आदमी ने आदित्य के पापा से वह टिकट लेकर अपना बहुत आभार जताया उनका हाथ अपने हाथों में लेकर ऐसे दबाया जैसे मानो वह दिल से दुआ दे रहे हो। फिर उन्होंने अपने बच्चों से कहा बच्चों आज हम आपको फैमिली क्लास  में सर्कस दिखाएंगे और थोड़ा नजदीक से। बच्चे भी बहुत खुश हो गए। अंकल जी ने आदित्य के पापा से कहा यह टिकट सच मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं ।आदित्य भी अपने पापा को बड़े गौर से देख रहा था ।और आदित्य समझ गया कि पापा ने उनको टिकट देने के लिए ही फ्री टिकट का बहाना बनाया था। वह खुश था कि अब वह बच्चे भी सर्कस देख पाएंगे। आदित्य ने भी सर्कस को खूब इंजॉय किया उसे बहुत मजा आया। आदित्य ने अपने पापा से उस दिन सीखा की देने में हमें कितनी खुशी मिलती है कि आज टिकट देने के बाद उन बच्चों के चेहरे की मुस्कान बरकरार थी।आदित्य को भी एहसास हुआ कि हुआ की असली मजाा तो देने मैं है ।यानी देने का शौक जो देना सीखता हैै जब देने के लिए आगे आते हैं देना सीखते हैं तब थोड़े के बदले हमें अक्सर ज्यादा मिलता है। दूसरों की चेहरे की मुस्कान की वजह अगर हम हैं तो इससे बढ़कर कोई अच्छा काम हो ही नहीं सकता ।इसलिए हमेशा देना सीखो फिर देखो कि आपको कितना सुकून मिलता है ।क्योंकि असली मजा तो देने में है ।
                                   🙏 धन्यवाद🙏


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