Tuesday, 5 May 2020

बांटने से ही बढ़ती हैं खुशियां।


 INTRODUCTION:

इंसान सारे काम अकेले नहीं कर सकता कभी ना कभी उससे किसी न किसी की मदद की जरूरत होती ही है अगर सब सिर्फ अपनी नहीं दूसरों की भी सुख सुविधाओं और उनका ध्यान रखते हैं तो यह समाज बहुत तरक्की करता है इसलिए हमें सिर्फ अपने बारे में ही नहीं दूसरों के बारे में भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का अच्छा ना लगे हमेशा उनकी मदद करने का ही काम करना चाहिए। किसी भी प्रकार से उनको सुख मिले हमें यही सोचना चाहिए। बच्चों महात्मा गांधी जी कौन है? हां हमारे देश के राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। बच्चों महात्मा गांधी भी जो कुछ भी उनके पास होता था उसके उपयोग को लेकर बहुत ध्यान रखते थे। उनके पास जो भी चीज होती थी जरूरत से ज्यादा वह दूसरों को बांट देते थे यहां तक कि अगर काम के बाद अगर पानी बच जाता था तो भी वह पानी फेंकते  नहीं थे कि वह काम आएगा किसी और को दे सकते हैं यही सोच कर पानी को भी संभाल कर रख लेते थे। पता है बच्चों एक बार महात्मा गांधी जी को किसी काम से बंगाल जाना था। तो रेलवे ने उनके लिए एक पूरा डिब्बा आरक्षित किया यानी कि रेलगाड़ी के डिब्बे में उनकी और उनके साथ जाने वाले लोगों को कोई तकलीफ ना हो इसे उनके लिए एक पूरी बोगी निर्धारित की गई। ताकि वह आराम से यात्रा कर सकें ठीक से।जिस समय जिस दिन उनको जाना था तो यात्रा आरंभ हुई। गांधीजी ने देखा कि उनके लोग और उनका सामान तो एक ही डिब्बे में बड़े आराम से आ गए हैं उन्होंने यह भी देखा कि बाकी डिब्बे में यात्री जो सफर कर रहे थे उस ट्रेन में जरूरत से ज्यादा थे उनको तो ठीक से बैठने की जगह भी नहीं थी। वह कठिनाई से पास पास बैठकर कष्ट के साथ यात्रा कर रहे थे। गांधी जी ने टी सी को बुलवाया और कहा कि अपनी यात्रा बड़े आराम से एक  साइड सीट पर बैठकर ही कर सकते हैं ।हम लोगों को बाकी सीटें दूसरे यात्रियों के लिए खाली कर देना चाहिए। यह सीटें  हम उनको आराम से बैठने के लिए देंगे ताकि बाकी लोग भी सुविधा के साथ यात्रा कर सकेंगे। गांधी जी से यह सुनकर उन्होंने कहा जिन्होंने यात्रा का प्रबंध किया था कि आप तो रेलवे को पहले ही इस सारी बोगी का किराया दे चुके हैं अगर आप यह सीट किसी और को भी देंगे तो आपको रुपया वापस नहीं मिलेगा और आपको कठिनाई भी हो सकती है। ऐसा सुनकर महात्मा गांधी जी ने कहा भले किराया ना मिले यह जरूरी नहीं है लेकिन दूसरे डिब्बे में क्षमता से अधिक यात्री बैठे हैं आराम से बैठ भी  नहीं पा रहे हैं ।तो हमें जरूरत से ज्यादा जगह लेने का अधिकार नहीं है। वह भी हमारी तरह नागरिक हैं हमारे बंधु है हमारे पास जगह ज्यादा है तो हमें उनको देना चाहिए। तब फिर उन्होंने अपना एक साइड की पूरी सीटें खाली कर दी और उनको आने दिया जो खड़े होकर यात्रा कर रहे थे डिब्बे में ।तो देखा बच्चों महात्मा गांधी जी ने भले किराया उनको वापस नहीं मिला वह आराम से सो कर अपने साथियों के साथ जा सकते थे लेकिन नहीं उन्होंने देखा कि बाकी डिब्बे में लोग आराम से नहीं बैठ पा रहे हैं और कुछ यात्री खड़े हैं तो उन्होंने उन को जगह दी भले उसका किराया उन्हें वापस नहीं मिला वहां आराम से सो कर भी अपने साथियों के साथ यात्रा कर सकते थे पर उन्होंने अपनी जगह दी। और जो भी वहां आकर बैठे यात्री वह बहुत खुश थे और उन्होंने महात्मा गांधी जी को दिल से धन्यवाद दिया ।तो देखा बच्चों हमें भी उनकी तरह सब के बारे में सोचना चाहिए आप किसी की किसी भी रूप में मदद कर सकते हैं उन्होंने खड़े यात्रियों को आराम से बैठने की जगह दी वह भी खुश और उनको देखकर महात्मा गांधी जी भी खुश तो बच्चों असली मजा तो देने में है।

STORY

        आदित्य को भी इसी सुख और संतुष्टि का अनुभव हुआ जब वह 11 साल का था आदित्य के जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि आदित्य को इस बात का एहसास हुआ की देने में कितना सुख और कितनी खुशी है। एक दिन आदित्य ने देखा कि उसकी कॉलोनी में सर्कस लगी है। तब उसने अपने पापा से कहा पापा हमारे यहां से सर्कस लगी हुई है आप मुझे भी सर्कस दिखाने ले चलिए। तब उसके पापा ने कहा ठीक है बेटा जिस दिन भी मुझे छुट्टी मिलेगी मैं आपको सर्कस दिखाने जरूर ले चलूंगा। एक-दो दिन के बाद उसके पापा को ऑफिस से छुट्टी मिली तब उन्होंने आदित्य से कहा आज समय से तैयार हो जाना आज हम सर्कस देखने चलेंगे। आदित्य तो खुश हो गया अरे वाह' कितना मजा आएगा आज तो मै सर्कस देखने जाऊंगा फिर आदित्य तैयार हो गया अपने पापा के साथ सर्कस देखने के लिए। आदित्य जब अपने पापा के साथ उस जगह पर पहुंचा जहां सर्कस लगी हुई थी तब उसके पापा टिकट खरीदने के लिए लाइन में खड़े हो गए कुछ लोग पहले से ही लाइन में खड़े थे उनका भी नंबर आने वाला था। आदित्य के पापा के पहले टिकट के लिए एक परिवार खड़ा था जिसमें एक अंकल और उनके तीन बच्चे हैं साफ नजर आ रहा था कि वह साधारण परिवार के हैं ।उनके कपड़े भी बहुत साफ-सुथरे नहीं थे लेकिन उनका व्यवहार बहुत अच्छा था ।वह शांति से अपनी टिकट लेने की बारी का इंतजार कर रहे थे और तीनों  बच्चे उत्साह के साथ एक दूसरे से बातें कर रहे थे कि उन्हें अंदर सर्कस में जोकर हाथी बंदर और बहुत सारे परिंदे भी देखने को मिलेंगे और अलग-अलग में करतब देखने को भी मिलेंगे। उनकी बातें सुनकर मानो ऐसा लग रहा था कि वह पहली बार सर्कस देखने जा रहे हैं अब उनकी टिकट लेने की बारी आ गई थी तब टिकट चेक नहीं पूछा आपको कितनी टिकट चाहिए तब उन्होंने जवाब दिया सर चार टिकट चाहिए एक मेरी बाकी तीन बच्चों की। मैं अपने पूरे परिवार को सर्कस दिखाने लाया हूं उन्होंने बड़े गर्व से कहा ।तभी टिकट काउंटर की भैया ने कहा कि आपको कौन सी क्लास का टिकट लेना है 3 क्लास के टिकट है? आपको कौन सी क्लास दे ? सबसे महंगा है बालकनी फिर उसके बाद फैमिली और फिर जनरल ।जो कि सस्ती है आपको कौन सी टिकट दे दे ?उसने कहा भाई साहब आप मुझे 4 टिकट जनरल  क्लास की दे दीजिए । टिकट वाले भैया ने चारों टिकट के पैसे जोड़कर बताएं पैसे सुनकर उनके चेहरे से मुस्कान ही चली गई। फिर उन्होंने खिड़की की तरफ झुकते हुए फिर से पूछा भाई साहब कितने पैसे बताया आपने टिकट क्लर्क में फिर से पैसे बताएं फिर अंकल को याद आया कि उनके पास तो इतने पैसे हैं ही नहीं। वह मन ही मन सोच रहे थे कि बच्चों से क्या कहेंगे वह खिड़की के काउंटर से बाहर आ गए बिना टिकट लिए। आदित्य के पापा यह देख रहे थे और उन्होंने समझ लिया था की पैसे की वजह से यह टिकट नहीं ले रहे हैं और बच्चों का बहुत मन है सर्कस देखने का तब उनको लगा कि क्यों न उन बच्चों के लिए हम टिकट लेकर दे दे लेकिन आदित्य के पापा ने सोचा ऐसे तो यह  टिकट लेंगे नहीं किसी से भी। तो क्या करना चाहिए ?तब आदित्य के पापा को  एक आईडिया आया। उन्होंने फटाफट सेेेे टिकट काउंटर से 6 टिकट ली 4  अंकल की फैमिली के लिए और 2 टिकट  अपने लिए। उन्होंने फैमिली क्लास की टिकट खरीदे थे ।तो वह  जल्दी से उन अंकल के पास गए और कहां  आप यह  चार टिकट ले लीजिए। अंकल ने कहा  नहीं मैं कैसे ले सकता हूं?तब उन्होंने कहा हमारी तो लकी ड्रॉ स्कीम में चार टिकट और फ्री मिली है और हम लोग तो सिर्फ दो हैं और तो कोई साथ नहीं है  हमारे लिए तो वैसे भी टिकट बेकार होने वाली है इससे अच्छा है आप बच्चों को सर्कस दिखा दे फ्री जो मिली है हमको।  उन अंकल ने आदित्य के पापा से पूछा सच यह टिकट आपको फ्री है? आदित्य के पापा ने कहा बिल्कुल फ्री में मिले हैं लकी ड्रॉ कूपन में मिले हैं हमको। वह किसी से मदद नहीं मांग रहे थे ।पर हालात लग रहे थे कि उनके बच्चे सच में सर्कस देखने के लिए बहुत एक्साइटिड है। उस आदमी ने आदित्य के पापा से वह टिकट लेकर अपना बहुत आभार जताया उनका हाथ अपने हाथों में लेकर ऐसे दबाया जैसे मानो वह दिल से दुआ दे रहे हो। फिर उन्होंने अपने बच्चों से कहा बच्चों आज हम आपको फैमिली क्लास  में सर्कस दिखाएंगे और थोड़ा नजदीक से। बच्चे भी बहुत खुश हो गए। अंकल जी ने आदित्य के पापा से कहा यह टिकट सच मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं ।आदित्य भी अपने पापा को बड़े गौर से देख रहा था ।और आदित्य समझ गया कि पापा ने उनको टिकट देने के लिए ही फ्री टिकट का बहाना बनाया था। वह खुश था कि अब वह बच्चे भी सर्कस देख पाएंगे। आदित्य ने भी सर्कस को खूब इंजॉय किया उसे बहुत मजा आया। आदित्य ने अपने पापा से उस दिन सीखा की देने में हमें कितनी खुशी मिलती है कि आज टिकट देने के बाद उन बच्चों के चेहरे की मुस्कान बरकरार थी।आदित्य को भी एहसास हुआ कि हुआ की असली मजाा तो देने मैं है ।यानी देने का शौक जो देना सीखता हैै जब देने के लिए आगे आते हैं देना सीखते हैं तब थोड़े के बदले हमें अक्सर ज्यादा मिलता है। दूसरों की चेहरे की मुस्कान की वजह अगर हम हैं तो इससे बढ़कर कोई अच्छा काम हो ही नहीं सकता ।इसलिए हमेशा देना सीखो फिर देखो कि आपको कितना सुकून मिलता है ।क्योंकि असली मजा तो देने में है ।
                                   🙏 धन्यवाद🙏


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