Tuesday, 21 July 2020

मिलेगा सही रास्ता और मिलेंगी खुशियां अपार।



INTRODUCTION ..........

बच्चों हम सब जिस क्लास में पढ़ते हैं उस क्लास का कोई न कोई मॉनिटर तो होता ही है ।मॉनिटर वही ना जो क्लास में जब तक एक पीरियड के बाद दूसरी  टीचर क्लास में नहीं आती तब तक क्लास को देखता है। तो हमारी टीचर क्लास में किस बच्चे को मॉनिटर बनाती है उसी बच्चे को ना जिसमें लीडरशिप की क्वालिटी हो जो क्लास को संभाल सकता हो। और टीचर बखूबी यह काम करती है कि कौन सा स्टूडेंट   ऐसा कर सकता है ।जिसमें लीडरशिप की क्वालिटी होती है टीचर उसे ही क्लास का मॉनिटर चुनती है ।ऐसे ही बच्चों हर काम के 2 तरीके होते हैं ।एक तो सोच समझकर सही चुनाव किया जाए ताकि आगे कोई समस्या ही ना हो ।दूसरा जल्दबाजी में कुछ भी करना इससे थोड़े समय के लिए काम आसान हो सकता है लेकिन फिर से हमें वही काम करना पड़ सकता है । जैसे एक  गार्डन  जिसमें बहुत सारी घास लगी हुई है और हमें वह घास साफ करनी है तो उसे साफ करने के लिए हमारे पास दो तरीके हैं ।पहला तरीका बहुत आसान है दूसरा तरीका थोड़ा मुश्किल है लेकिन वह तरीका ज्यादा समय तक रिजल्ट देता है अच्छे नतीजे देता है। पहले तरीके में हम घास को मशीन से साफ कर सकते हैं लेकिन इस तरीके से घास जड़ से नहीं निकलेगी ऊपर से कटेगी और कुछ टाइम के बाद घास फिर आएगी। दूसरा तरीका है आराम से झुक कर बैठ कर हाथ से  घास को जड़ से निकालना थोड़ी मेहनत का काम है लेकिन ऐसा करने से वह घास जङ से निकल आएगी और काफी समय तक नहीं निकलेगी। पहला तरीका आसान है जड़ से खत्म नहीं हुई लेकिन दूसरा तरीका थोड़ा मेहनत वाला लेकिन समस्या जैसे खत्म हो जाएगी। तो बताओ बच्चों हमें घास की सफाई के लिए कौन सा तरीका अपनाना चाहिए ?बिल्कुल सही- दूसरा तरीका- यही सही चुनाव है। राइट सिलेक्शन बच्चों हमें भी सिर्फ चीजों को बाहर से नहीं देखना है बल्कि अंदर तक उसकी जांच परख करके हमें चुनाव करना चाहिए। हमारे जीवन में सही चुनाव का बहुत महत्व है क्योंकि अगर सही दिशा है तो हमारी दशा भी सही होगी। यानी हमारा  तो  भला ही भला होगा। लेकिन कई बार अगर हमारा चुनाव सही नहीं होता तो हमें काफी कड़वे अनुभव भी हो सकते हैं यानी जो परिणाम हमको मिलेगा हमारे गलत चुनाव के कारण उससे हमें खुशी नहीं मिलेगी ना ही हमारा काम बनेगा ।इसलिए हमें जब भी चुनाव करना है सोच समझ कर करना है चाहे वह चुनाव फ्रेंड्स बनाने के लिए हो या फिर चीजों के लिए हो फैसला लेने में या किसी का भी चुनाव करने के लिए हमें जल्दबाजी नहीं करनी है बिना सोचे समझे चुनाव करने के बाद हमें पछताना भी पड़ सकता है कैसे जानते हैं अपनी अगली कहानी में
   

   Story


बच्चों आप सब ने भी राजा रानी की कहानियां सुनी होगी। राजकुमार कौन होता है? बच्चों और राजा के बेटे  हम राजकुमार कहते हैं और राजा की बेटी होती है उसे राजकुमारी ।तो आज हम आपको सुनाएंगे राजकुमार अनिरुद्ध की कहानी जिसे घोड़ों का शौक था और उनका सबसे प्यारा घोड़ा था सुल्तान ।सुल्तान राजकुमार का सबसे प्यारा घोड़ा था राजकुमार जहां भी जाते वहां सुल्तान के साथ ही जाते थे। सुल्तान बहुत ही सुंदर घोड़ा एकदम काला और काली लंबी-लंबी उसकी पूंछ। वह इतना तेज दौड़ता था मानो हवा से बातें कर रहा हो।
राजकुमार ने अभी तक बहुत सारी रेस सुल्तान के साथ जीती थी जब भी घोड़ों की रेस होती है थी तो वह सुल्तान के साथ ही उस रेस में हिस्सा लेते थे। अब तक सारी रेस  उन्होंने  सुल्तान के साथ जीती है इसलिए उन्हें सुल्तान पर बहुत गर्व था ।राजकुमार ने सुल्तान को कभी किसी तरह का  दबाव  नहीं दिया था। सुल्तान को अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे ।उसका बहुत ध्यान रखते थे। जब वह सुल्तान पर सवारी करते तो इस बात का ध्यान रखते की सुल्तान आसानी से दौड़ पा रहा है कि नहीं सुल्तान थका हुआ तो नहीं है ।राजकुमार अपनी खुद की सवारी के लिए मशहूर थे उन्हें कोई भी घोड़ा मिल जाए वह उसको अपना फ्रेंड बना ही लेते थे। उसके साथ अपना तालमेल बना ही लेते थे क्योंकि जानवरों के लिए उनके मन में बहुत प्यार और दया की भावना थी। किसी भी घोड़े को वह अपनी तरफ खींच लेते थे लेकिन सुल्तान के बाद उन्होंने किसी और घोड़े की तरफ देखा ही नहीं था। एक बार राजकुमार अनिरुद्ध एक दौड़ में शामिल होने के लिए जा रहे थे तब उनके पड़ोस के राज्य के राजकुमार अनिकेत ने उनको एक इनविटेशन यानी आमंत्रण भेजा और कहा आप हमारे राज्य से होकर जा रहे हैं तो क्यों ना एक दिन आप हमें अपनी सेवा का मौका दें ।और फिर हम सब साथ में दौड़ में शामिल होने के लिए साथ में चलेंगे राजकुमार अनिकेत का दोस्ती भरा इनविटेशन पाकर राजकुमार अनिरुद्ध ने उनका निमंत्रण मान लिया और राजकुमार 1 दिन पहले अपने महल से निकलकर जैसे ही राजकुमार अनधिकृत के  महल के पास पहुंचे तो उन्होंने ने देखा की राजकुमार अनिकेत ने उनके स्वागत के लिए बहुत सारी तैयारी  की है। वह खुद भी उनके स्वागत के लिए खड़े थे। जब दोनो राजकुमार मिले तो राजकुमार अनिकेत ने कहा हमारा निमंत्रण पर आने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कहते हुए उन्होंने राजकुमार अनिरुद्ध को अपने गले से लगा लिया। और फिर उनके साथ उन्होंने उसका घोड़ा देखा उन्होंने कहा अरे वाह कितना शानदार घोड़ा है आपके पास ।बताओ बच्चों राजकुमार अनिरुद्ध के घोड़े का क्या नाम था ?बिल्कुल सही -सुल्तान
  अनिकेत ने कहा इस घोड़े के साथ तो आपकी जीत पक्की है ।राजकुमार अनिरुद्ध आपका सुल्तान तो बहुत फेमस है सब लोग जानते हैं आपके और आपके घोड़े के बारे में और आज तो अपनी आंखों से इसे देख भी लिया भाई वाह वाकई बहुत ही खूबसूरत और शानदार घोड़ा है आपका। राजकुमार अनिरुद्ध भी अपने घोड़े सुल्तान की तारीफ सुनकर बहुत खुश हुए फिर राजकुमार अनीकेत उनको महल के अंदर लेकर गए और जब सिपाही राजकुमार के घोड़े को अस्तबल की ओर ले जाने लगे ।
बच्चों अस्तबल पता है क्या होता है जिस जगह पर घोड़ों को रखा जाता है उस जगह को अस्तबल कहते हैं। जब सैनिक सुल्तान को अस्तबल ले जाने लगे तभी राजकुमार अनिकेत ने कहा कि सुल्तान का बहुत ध्यान रखना और अलग शाही ठाट बाट से रखना ऐसे सुल्तान का बहुत ध्यान रखना यह सुनकर तो सुल्तान के कान खड़े हो गए सुल्तान को बहुत अच्छा लग रहा था खुद की तारीफ सुनकर शाही स्वागत और शाही ठाठ बाट इतना मान सम्मान यह सब देखकर तो बहुत खुश हो गया बच्चों पशु पक्षी बोल नहीं सकते लेकिन उनकी भी भावनाएं होती है फिर रात को दोनों राजकुमारों ने मिलकर खाना खाया। राजकुमार अनिरुद्ध और अनिकेत में रात का खाना खाने के बाद जब राजकुमार अनिरुद्ध सोने के लिए चले गए तो राजकुमार अनिकेत वह अपने कमरे में सोने नहीं गए वह गए अनिरुद्ध के घोड़े सुल्तान के पास। उन्होंने सुल्तान से पूछा क्यों सुल्तान कैसा लग रहा है ?यहां पर कोई कमी तो नहीं लग रही सुल्तान तो बड़े मजे में था उसने सिर हिलाकर अनिकेत को हर चीज के लिए धन्यवाद दिया। फिर राजकुमार ने आगे कहा सुल्तान अगर तुम कल की रेस में मेरा साथ दोगे मेरा चुनाव करोगे तो जीवन भर ऐसे ही शाही ठाट बाट में मिलेंगे अब फैसला तुम्हारे हाथ में है ।सोच लो कल तुम्हारा एक सही चुनाव तुम्हारी जिंदगी बदल देगा ।ऐसा कहकर राजकुमार अनीकेत  वहां से चले गए ।
राजकुमार अनिकेत की बातें बार-बार सुल्तान के कानों में गूंज रही थी सवेरे जब सभी लोग दौड़ में जाने के लिए तैयार हुए राजकुमार के घोड़ों को भी लाया गया जब राजकुमार अनिरुद्ध अपने घोड़े सुल्तान की तरफ बढ़े तो यह क्या सुल्तान जोर जोर से हिन हिना ने लगा ।राजकुमार अनिरुद्ध कुछ समझ पाते इसके पहले ही सुल्तान ने अपना चुनाव कर लिया था वह राजकुमार अंनिकेत के पास जाकर खड़ा हो गया। राजकुमार अनिरुद्ध ने बहुत कोशिश की कि उसके साथ घोड़ा आगे बढ़े लेकिन सुल्तान तो हिला ही नहीं ।यह देख कर राजकुमार अनिरुद्ध की आंखों में आंसू आ गए क्योंकि उन्होंने सुल्तान को अपने बच्चे की तरह पाला था उन्हें लग रहा था कि आज कहीं मैंने अपने बच्चों को तो नहीं खो दिया फिर क्या था। सुल्तान और अनिकेत दौड़ के लिए निकल पड़े पता है बच्चों इस पूरी घटना में परेशान केवल राजकुमार अनिरुद्ध नहीं थे बल्कि एक और घोड़ा भी परेशान था जिसका नाम था शालीमार जो कि राजकुमार अनिकेत के घोड़े का नाम था। और शालीमार ने पूरे जीवन राजकुमार अनिकेत की सेवा की थी। और कई दौड  जीती थी और कई बार तो उन्हें चोट लगने से भी बचाया था। लेकिन सुल्तान को पाने की चाहत में राजकुमार अनिकेत ने तो अपने पहले पुराने प्यारे घोड़े शालीमार को पलट कर भी नहीं देखा। राजकुमार अनिरुद्ध और शालीमार दोनों अकेले खड़े थे ।तभी शालीमार को राजकुमार अनिरुद्ध  प्यार से हाथ फेरते हुए  बड़े प्यार से देख रहे थे शालीमार भी राजकुमार अनिरुद्ध को बड़े प्यार से देखने लगा। तब राजकुमार अनिरुद्ध ने सोचा कि भले ही तेज रफ्तार वाला घोड़ा नहीं है लेकिन अगर मैं इसके ऊपर भी सवारी करके दौड़ में जाऊं तो शायद इसे भी अच्छा लगेगा ।नहीं तो यह भी अकेला उदास खड़ा होगा और राजकुमार अनिरुद्ध तो वैसे भी सभी जानवरों को बड़े प्यार से अपना तालमेल बैठा लेते थे । फिर राजकुमार अनिरुद्ध ने बड़े प्यार से शालीमार को गौर से देखा और उसके सिर पर हाथ से में लगे और सहलाने लगे फिर राजकुमार ने शालीमार से कहा चलो शालीमार आज मेरी और तुम्हारी दोनों की सबसे बड़ी  दौड़ होगी ।यह दौड़ सवारों की दौड़ नहीं बल्कि सही चुनाव की दौड़ होगी जिंदगी में एक सही चुनाव की दौड़ ऐसा कहकर राजकुमार अनिरुद्ध शालीमार पर सवार हो गए ।फिर क्या शालीमार भी पूरे जोश में हवा को चीरते हुए आगे बढ़ गए राजकुमार अनिरुद्ध और शालीमार भी जल्दी से दौड़ वाली जगह पर पहुंच गए ।जहां पर सुल्तान किसके साथ खड़ा था बच्चों ?      बिल्कुल सही राजकुमार अनिकेत के साथ और राजकुमार अनिकेत का घोड़ा  शालीमार वह खड़ा था राजकुमार अनिरुद्ध के साथ यानी दोनों राजकुमार के घोड़े एक दूसरे के साथ खड़े थे ।क्योंकि सुल्तान ने अपने राजकुमार को छोड़कर दूसरे राज्य के राजकुमार अनिकेत का चुनाव किया था। थोड़ी देर में रेस दौड़ शुरू होने वाली थी ।राजकुमार अनिकेत सुल्तान को लेकर राजकुमार अनिरुद्ध के पास है और कहा मेरे दोस्त मेरे मित्र मुझे आज तुम्हारे लिए अच्छा नहीं लग रहा है-  कहां पर सुल्तान और कहां पर शालीमार दोनों का कोई मुकाबला नहीं है तब राजकुमार अनिरुद्ध ने जवाब दिया दोस्त तुमने बिल्कुल सही कहा सुल्तान और शालीमार का कोई मुकाबला नहीं है सुल्तान ने आखिरी वक्त पर मेरा साथ छोड़ दिया जबकि मैंने इसे बड़े प्यार से रखा था लेकिन शालीमार ने जरूरत के वक्त मेरा साथ दिया ।तो सुल्तान की नजरें झुक गई यह  सुनकर फिर राजकुमार कुमार अनिकेत ने सुल्तान से कहा सुल्तान तो तुमको  हर बार की तरह इस बार भी जीतना होगा मेरे लिए ।लेकिन राजकुमार अनिरुद्ध ने शालीमार से कहा शालीमार तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं जो होगा अच्छा होगा। जीत भी  हमारी होगी और हार भी हुई वह भी हमारी होगी। फिर जैसे ही ऐलान हुआ की बस दौड़ शुरू होने वाली है  तो 100 से भी ज्यादा घुड़सवार दौड़ के लिए तैयार हो गए ।रेस शुरू हुई । सुल्तान हर बार की तरह फर्स्ट नंबर पर दौड़ रहा था ।और शालीमार तीसरे नंबर पर था जैसे ही दूसरे नंबर वाले घुड़सवार ने सुल्तान से बराबरी की यानी 1 नंबर पर आने लगा तो राजकुमार अनिकेत ने भी सुल्तान की लगाम खींची ताकि वह और तेज दौड़ सके लेकिन ऐसे व्यवहार की सुल्तान को तो बिल्कुल आदत नहीं थी। क्योंकि राजकुमार अनिरुद्ध ने तो बड़े आराम से उनकी सवारी की थी तो तेजी से लगाम खींचने के कारण सुल्तान अपना संतुलन खो बैठा उसका सन्तुलन balance इधर-उधर होने लगा तो इसका असर उसकी रफ्तार पर भी हुआ। उसकी स्पीड स्लो हो गई इसी बीच राजकुमार अनिरुद्ध ने घोड़े शालीमार के साथ सुल्तान की बराबरी कर ली राजकुमार अनिरुद्ध इतने में नॉरमल लेवल पर उसकी लगाम थामने हुए बिना किसी दबाव के शालीमार को दौड़ने की पूरी आजादी के साथ दौड़ रहे थे ।जिसके चलते शालीमार बहुत अच्छी स्पीड पकड़ चुका था उसकी रफ्तार बहुत तेज हो गई थी दोनों हार जीत की सोच से परे थे बस एक दूसरे का साथ देते हुए बिना किसी को देखें आगे बढ़ते जा रहे थे एक दूसरे पर विश्वास करते हुए। अपने चुनाव पर भरोसा करते हुए तो बताओ बच्चों इस दौड़ का क्या रिजल्ट हुआ होगा ?राजकुमार अनिरुद्ध और शालीमार ने तो पूरा पासा ही पलट दिया वहीं दूसरी ओर सुल्तान गलत हाथ में लगाम जाने की वजह से बहुत पछता रहा था  ।   पहली बार सुल्तान ने कोई दौड़ नहीं जीती थी। एक गलत चुनाव के कारण पिता की तरह प्यार करने वाले राजकुमार अनिरुद्ध को भी उन्होंने खो दिया था ।और दूसरी तरफ शालीमार ने सही मालिक का चुनाव किया उसे एक नेक दिल  जानवरों से प्यार करने वाले मालिक को पाया ।उसके जीवन को एक नई दिशा मिली तो थोड़ी सी लालच के कारण उसने गलत का साथ दिया।
 कुछ भी चुनते समय यदि सोचेंगे समझेंगे करेंगे विचार तो मिलेगा सही रास्ता और मिलेंगी खुशियां अपार।

                                   🙏  धन्यवाद 🙏


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Wednesday, 8 July 2020

अपने लक्ष्य पर रखिए पहली नजर ।


बच्चों सब की यही इच्छा होती है कि कोई भी काम किया जाए उसमें सफलता हासिल हो। इतिहास में लोंगों को उनकी स्रफलता और उपलब्धियों के कारण याद किया जाता है। एक बार एक क्रामयाब व्यक्ति
का इंटरव्यू चल रहा था, काफी सारे पत्रकार उनको घेरकर उनसे सवात्र पूछ रहे थे। एक पत्रकार ने उनसे
सवाल किया सर॒ आप इतने सफल रहे हर क्षेत्र में आप की इस सफलता की उड़ान का क्‍या रहस्य हैं ? उन्होंने
 जवाब विया कि सबसे पहले हमें हमारे जीवन के लक्ष्य यानी उद्देश्य के बारे में जानना चाहिए।
अगर आपको अपनी मंजित्र नहीं पता हैं कि हमें कहां जाना हैं तब तक यात्रा नहीं कर सकते। इसलिए
सबसे पहले यह निश्चित करना जरूरी हैं कि हम जीवन में क्या बनना चाहते हैं इसीलिए त्लक्ष्य का होना बहुत जरूरी हैं। यदि जीवन मे कोर्ड हमारा लक्ष्य नहीं है तो यह ऐसा ही है जैसे कोई नाव हो बिना पतवार के।
 ईमानदारी से मेहनत करनी होगी।

सफलता की उडान के लिए किसी को प्रेरणा यानी कि किसी से सीख ल्रेकर जब हम कोई काम करते
है ऑर  प्रसीना चाहिए यानी कड़ी मेहनत। मेहनत ही हमें बच्चो हर काम में सफलता की चोटियों तक
ले जा सकती हैं।.....

जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने के लिए सबसे पहले जरुरी हैं सकारात्मक सोच हर व्यक्ति की अपनी काबिलियत ह्येती हैं और सभी को अपने गुणों के आधार पर ही अपने खुद के लक्ष्य बनाने चाहिए किसी दूसरे को देखकर नहीं। कोर्ई संगीत में अच्छा हो सकता हैं, कोई डांस में, किसी को गणित अच्छी लगती हैं तो किसी को डतिहास।
 जीवन मे आगे बढ़ने के लिए लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

अगर आपको दिशा पता हैं कि आपने किस रास्ते से जाना हैं तो मंजिल तक पहुंचना आसान हो जाता हैा  हैं। जैसे बच्चों आपको सवेरे सवेरे स्कूल जाना हैं तो आप जानते हैं कि कौन सा रास्ता आपको स्कूल की ओर ले जाता हैं और आप बिना रास्ता अटके अपनी स्कूल पहुंच जाते हैं। सोचो अगर रास्ता ना प्रता हो तो क्‍या मंजिन तक पहुंच पाएंगे?

जैसे बच्चो  हवा का रुख जिस दिशा में हो उसी दिशा की ओर बनेंगे तो हमारी ऊर्जा कम लगेगी। विपरीत
दिशा में चनेंगे तो वह ज्यादा लगेगी। वैंसे ही हमारा मन जिस काम में ज्यादा लगता हैं या हमारी रुचि
जिसमें ज्यादा होती हैं या जो गुण हमारे अंदर हैं उसके हिसाब से उद्देश्य बनाएंगे तो सफ़लता शीघ्र मिलती
हैं। फ़िर आपको यह जानना हैं कि आपको किस काम को करने में खुशी ज्यादा मिलती हैं। जिस काम को
करने की इ्चच्छा हो, अपनी कार्य क्षमता के साथ उसे पूरा करने के लिए जरुरी हैं। सही लक्ष्य का चुनाव, यही
सफल्रता की उड़ान का पहला कदम हैं।

बच्चों हम बात कर रहे है विक्रम जी की, जो देश के पहने व्यकित हैं जिन्हें पैसों से कार चलाने का लाइसेंस मिला। विक्रम जी छोटे थे उनको अपने दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद भी उन्होंने अपने जीवन में लक्ष्य बनाएं
और उस लक्षय को पाने के लिए उन्होंने बड़ी मेहनत की। उनके प्रिवार मैं उनके माता पिता ने हमेशा सिखाया जिंदगी जो भी दिन दिखाए मुस्कुराते हुए उसका सामना करना चाहिए। पहले विक्रम जी ने लक्ष्य बनाया की वह ज़रूरी काम के किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे जैसे खाना प्रीना, पढ़ना लिखना। उनके दोनों
हाथ न होने के बाद भरी उन्होंने करो पैरों से ही पढ़ना लिखना और बाकी काम बढ़त मेहनत से सीखे ऑर अब वह अपने रोजमर्रा के कामो को अपने पैरों से करते हैं ऑर वह॒ किसी पर भी निर्भर नहीं हैं।

हालांकि विक्रम पहले से ही अपने सारे काम खुद से कर लेते थे लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि अपनी
 जरूरतों के निए वह दूसरों पर निर्भर हैं। क्‍योंकि विक्रम जी कॉलेज जाने के लिए खुद से रैडी हो जाते
थे लेकिन उनका दौस्‍त उनको लेने आता था उनको कॉलेज तक साथ  फ़िर कमी किसी कारण
से अगर उनका दौस्त नहीं आ पाता था तौ उनके प्रापा कौ अपना काम छोड़कर विक्रम जी को कॉलेज छोड़ने
जाना पड़्गा था। तब उन्होंने एक और लक्ष्य बनाया कि वह कार चलाना स्रीखेगें ऑर जहां जाना होगा खुद
से कार चला कर जाएंगे।

सुनने में उनका ल्रक्ष्य कितना मुश्किल लगता हैं? बच्चो? कि पैयों से कार चल्राना सीखना। विक्रम जी ने अपना
लक्ष तो बनाया कि वह कार चलाना स़रीखेगे ताकि उनके कारण किसी को परेशानी ना हो। लेकिन मुश्किलवाली बात थी कि उन्हें कार चलाना सिखाए कॉन?  फ़िर विक्रम जी एक ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट  गए। वही
स्कूल जहां कार चलाना स़िखाते है। वहाँ जाकर उन्होंने बोला कि मुझे कार चल्राना सीखना हैं तो आई
कर वहां के सर ने कहा कि आपके दोनों हाथ नहीं है आप कैंसे कार चलाना सीख सकते  हैं ।
विक्रम जी आरटीओ यानी रीजनत्र ट्रांसपोर्ट ऑफ्रिस ग्रए जहाँ से उनको ड्राड़विंग लाईसैंस मिल सके।

जब विक्रम जी आरटीओ ऑफिस गए तो उन्होंने अपने ड्राड़विंग लाईसैंस के ल्रिए प्रार्थना पत्र दिया तो ऑफिस
_वालों  ने उन्हें मना कर दिया कि ऐसा कोर्ड नियम नहीं हैँ जिसके बिना हाथों के पैरों से गाड़ी चलाने वाले कौ
लाइसेंस दिया जाए। वह ऑफिस से वापस आ गए पर उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं बदला।

उन्होंने फ़िर अपने राज्य के मंत्री जी कौ एक पत्र लिखा कि अगर हमारा नारा " सबका साथ सबका विकास"
 तो बिना हाथ  वाले व्यक्ति को ड्रड़विंग लाडसेंस क्यों नहीं मिल सकता। फ़िर विक्रम जी ने ट्रासपॉर्ट
कमिश्नर के आगे पैरों से कार चला कर विखाई। इसके बाद उस राज्य के मंत्री जी ने कहा कि हम आपके
स्राथ कार मैं बैठकर चलेंगे। विक्रम जी ने अपने स्रीधे पैर कौ स्टेरिंग पर रखा ऑर उल्टा पैर एक्सीलेटर
पर रखा ऑर गाड़ी को स्टार्ट कर चलाने लगे। काफ़ी देर तक उन्होंने मंत्री जी कौ कार चला कर दिखाई।
मंत्री जी भी उन्हें पैंगों से कार चलाते बड़े ध्यान से देख रहे थै। उन्होंने विक्रम जी कौ कार चलातें हुए एक
वीडियो भी बनाया।

पूरी वीडियो परिवहन आयुक्त को भ्रेजा गया जो अंतिम फैसला लेंगे। संभवत यह दैश का  पहला
मामला था जब दोनों हाथ नहीं होने के बाद भी किसी व्यिक्त ने यात्री टेस्ट दिया था। ऑर उनकी इतनी अच्छी ड्राड़विंग देखने के बाद लाइसेंस दैने के लिए नियम देखे गए कि क्या पैंरोँ से स्टेरिंग संभालने पर भी लाइसेंस जारी किया जा सकता हैं? उनका पूरा मैडिकल चेकअप भी हुआ क्योंकि अगर परिवहन विभाग विक्रम नी कौ लाइसेंस जारी करता हैँ तो यह देश का ऐसा पहला मामला ह्येगा जिसमें एक विशेष गुण यानी दिव्यांग व्यक्ति को सडकों पर गाडी
चल्राने की। आखिरकार विक्रम जी को ड्राइविंग लाइसेंस  दिया गया।

तो देखा बच्चों लक्य पाने के लिए कितनी भी बाधाएं आई पर विक्रम जी ने हमेशा अपना ध्यान सिर्फ लक्ष्य
प्राप्ति पर रखा। उसके बाद उन्होंने एक कार रेस में भी हिस्सा निया ऑर उसमें उन्होंने फर्स्ट प्राइस जीता।
बच्चों विक्रम जी सिर्फ कार ही नहीं चलाते थे। बल्कि उन्होंने कॉमर्स में प्रोस्ट ग्रेजुएशन भी किया ऑर आज
वह एक सफल व्यवसाई हैं। स्विमिंग भी बहुत अच्छी करते हैं। विक्रम जी लाखों लोगों की प्रेरणा हैं तभी तो
बच्चों लक्‍य बनाना ही नहीं हैं पूरा करने के लिए मेहनत भी करनी चाहिए।

                          🙏 धन्यवाद 🙏