Tuesday, 28 April 2020

असली मजा तो देने में है।

Give things to poor

INTRODUCTION.
             बताओ बच्चों 25 दिसंबर को क्या मनाया जाता है ?बिल्कुल सही किसमस डे ।टॉफिया कौन बैठता है? बच्चों  बिल्कुल सही सैंटा क्लॉस। इस दिन कई लोग सैंटा क्लॉस का रूप बनाकर छोटे-छोटे बच्चों को टॉफिया बांटते हैं। आपने देखा होगा ना बच्चों आपके आसपास कोई न कोई ऐसा होगा जो अक्सर टॉफीया बाँटते होंगे ।जानते हो वे बच्चों को टॉफिया क्यों बांटते हैं ?क्योंकि उनको टॉफी के बदले सुख मिलता है। कैसा सुख देने का सुख क्योंकि असली मजा तो देने में है ।यह ऐसा सुख है जो हमें तब मिलता है या इस सुख का अहसास तब होता है जब हम देना सीखते हैं ।ऐसी खुशी जो दूसरों के चेहरे पर झलकतीहै जब आपकी छोटी सी मदद के कारण उनका कोई काम पूरा हुआ हो या जब आप उनको कुछ देते हैं। देना एक मानवीय गुण है जो देता है दूसरों के लिए करता है सही अर्थ में वही मानव है ।मनुष्य वही जो मनुष्य के लिए करें वरना जानवर तो आप ही आप चरे।
प्रकृति से भी हमें कितना कुछ मिलता है प्रकृति तो सिर्फ देती है कुछ लेती नहीं है बदले में। जैसे सूर्य के प्रकाश से संसार को रोशनी मिलती है चंद्रमा से शीतलता बादलों से बारिश हवा से जीवन फूलों से खुशबू पेड़ पौधों से फल सब्जियां नदियों से पानी और भी न जाने कितना कुछ वह अपने लिए कुछ भी नहीं रखते तभी तो तुलसीदास जी ने भी कहा है -तरुवर कबहु न फल भखै। नदी न संचय नीर परमारथ के कारण साधु धरा शरीर। यानी पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते ।नदियां भी अपना पानी खुद नहीं पीती । तो असली मजा देने में है ।
 जो देना सीखता है सबके साथ बाँटता है 
  वही अनमोल सुख को पाता है ।
क्योंकि असली मजा तो सबको देने में है।
थोड़ा देखकर बहुत सारा सुख पा लेना अक्सर हम सभी के साथ ऐसा होता है अपने छोटे भाई बहन को अपनी मनपसंद कोई चीज देनी पड़ती है तो हम उन्हें देते हैं या फिर उनके मांगने पर मना कर देते हैं देकर देखना बच्चों जब आप अपने भाई बहन को मांगने पर वह चीज देते हैं जो आपको बहुत पसंद है तब क्या होता है आपके भाई बहन खुश होकर आप से गले मिलते होंगे ।आपको थैंक्यू कहते होंगे। उस वक्त हमें जो खुशी प्यार सुख मिलता है वह बहुत अनमोल होता है ।तो अनमोल सुख कब मिलेगा? जब हम देना सीखेंगे। जरूरी नहीं भाई बहन को ही दे हम किसी को कुछ भी दे सकते हैं। देने का गुण हमारे अंदर हो तो हम किसी को भी कुछ भी देकर एक अच्छा काम करते हैं क्योंकि असली मजा तो देने में है ।
यही बात वंश भी जानता था । वंश और  प्रतीक दोनों बहुत अच्छे दोस्त। एक बार प्रतीक वंश के पास आया और उससे वंश को अपना बहुत सुंदर बैट दिखाया। प्रतीक ने कहा देखो मेरा बैट कैसा लग रहा है? वंश ने बैट देखा और कहा अरे वाह यह तो बहुत अच्छा बैट  है कहां से आया तुम्हारे पास। तब प्रतीक ने कहा मुझे मेरे बङे भाई ने पूरी क्रिकेट किट दी है । यह बैट भी उस मे था ।वश हाथ में बैट उठा कर देख रहा था ।उसके बाद प्रतीक में वंश से कहा कि क्या सोच रहे हो यही ना कि काश मेरा भी बड़ा भाई होता तो मुझे इतना अच्छा बैट  गिफ्ट करता। वंश ने  कहा नहीं- मैं तो यह सोच रहा हूं कि मैं इस लायक बनू  कि मैं अपने छोटे भाई को ऐसा बैट ले कर दूं क्योंकि जो खुशी तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारे बड़े भाई ने दी है वही खुशी मैं अपने छोटे भाई को भी दू  क्योंकि असली मजा तो देने में है। जो देने में सुख है वह पाने में नहीं है ।
STORY-
यही बात एक बार एक गुरु अपने शिष्यों को समझा रहे थे की असली सुख देने में है पाने में नहीं है तभी अचानक एक शिष्य उठकर बोला यह कैसे संभव है हमें तो पाकर सुख मिलता है हमें खुशी होती कि हमें कुछ मिला है तो फिर देने में कैसे?तभी उनके गुरु जी ने शिष्य को एक खाली बोरी दी और दूसरे शिष्य को खाने के सामान से भरी हुई बोली दी फिर उनके गुरु जी कहते हैं तुम दोनों को 10 कोस यानी कि 30 किलोमीटर तक यह बोरी लेकर चलना है फिर वापस आना है उसके बाद मैं आप सभी को समझा लूंगा की देने में कितना सुख है जिसे भरी हुई बोली भी गई थी उसकी बोली काफी भारी थी कयोंकि उस में खाने पीने का सामान था। उनके  गुरुजी ने कहा तुम्हें रास्ते में जो भी जरूरतमंद दिखे उन्हें इस बोरी में से खाने का सामान बाँट आना है। शिष्य ने कहा जी गुरु जी जैसा आप कहें मैं ऐसा ही करूंगा जो रास्ते में जरूरतमंद दिखेगा मैं उसको खाने का सामान बांटा आऊंगा  और गुरु जी ने खाली बोरी वाले वाले शिष्य से कहा रास्ते में जो भी कीमती सामान आपको दिखे  वह आप इस बोरी में डालते जाना शिष्य ने सोचा कि तो बड़े आराम से करूंगा।  यह काम तो बहुत आसान है क्योंकि मेरी बोरी तो खाली है।  जो कीमती सामान मिलेगा उसे मैं बोरी में भरता जाऊंगा ऐसा कहकर उसने गुरुजी से कहा ठीक है गुरु जी मैं ऐसा ही करूंगा। और दूसरा शिष्य जिसके पास सामानों से भरी बोरी थी क्योंकि उसमें वजन था इसलिए वह धीरे धीरे चल पा रहा था  क्यो कि उसमें खाने का सामान भरा हुआ था ।दोनों निकल पड़े थोड़ी दूर चलते ही खाली बोरी वाले शिष्य को एक कीमती पत्थर दिखा उसने उसे उठाकर अपनी बोरी में डाल दिया फिर थोड़ी दूर जाने पर उससे और भी कीमती पत्थर मिला वह बोरी में भरता हुआ चला गया। वह बोरी में जब अलग अलग चमकदार सुंदर कीमती पत्थर डाल रहा था तब उसकी बोरी वजन से बढ़ती जा रही थी। इतना दूर भी चलना था ।चलते चलते थक गया एक एक कदम अब तो मुश्किल से चला जा रहा था। दूसरी तरफ वह शिष्य जिसकी पूरी भरी हुई थी जैसे जैसे चलता गया और रास्ते में उसे जो भी जरूरतमंद मिलता गया उसने बोरी में से खाने पीने का सामान निकालकर उनको बांटता  गया और वह जिसको भी जरूरतमंद को खाने पीने का सामान बांट रहे थे उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे वह बहुत खुश थे।और धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उनका चलना भी आसान। जो बांटता गया उसका मंजिल तक पहुंचना आसान और सुखद होता गया और जो सिर्फ अपनी बोरी  में जमा ही कर रहा था वह वापस अपनी मंजिल तक पहुंचने में थक गया क्योंकि इतनी सारा सामान अपने बोरी में भरा था ।सभी शिष्यों ने देखा कि कौन सा शिष्य आसानी से अपनी मंजिल पर पहुंचा जो बांटता गया वह या जो जमा करता गया वह?  बताओ बच्चों कौन सा शिष्य गुरु जी के पास पहले पहुंचा?बिल्कुल  सही वही शिष्य जो सबको बांट रहा था। जो इकट्ठा करता गया वह तो थक चुका था और वापस अपनी मंजिल तक नहीं जा पाया। सभी शिष्यों ने देखा कि कौन मंजिल तक आसानी से पहुंच पाया और सभी शिष्यों को बात समझ में आ गई कि जो देता है वही सुख को पाता है ।क्योंकि असली मजा तो देने में है आप ही सोचिए बच्चों मंजिल तक आसानी से कौन पहुंच पाया जो देता गया वह कि जो बोरी भरता गया वह जीवन में हम भी इकट्ठा  करने की जगह बांटना सीखेंगे तो हमारा जीवन भी सुखी  और आसान हो सकता है। यह देने का गुण हमें एक अच्छा इंसान बनाता है जो भी इंसान किसी की भी किसी भी रूप में मदद करता है तो उसके चेहरे पर अगर उसके कारण मुस्कान आती है उसकी मुस्कान देखकर हमें जो खुशी मिलती है संतुष्टि का अनुभव होता है वह बहुत अनमोल होता है। तभी तो कहते हैं बच्चों जो देना सीखता है सबके साथ बैठता है वही अनमोल सुख को पाता है।
                                     🙏 धन्यवाद🙏                                    


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